LLB Hindu Law Chapter 7 Book Notes Study Material PDF Free Download

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अध्याय 7, दाय तथा उत्तराधिकार, हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के सहित। (सामान्य सिद्धान्त पूर्व विधि) (Hindu Law Notes)

दाय की दो पद्धतियाँ : मिताक्षरा तथा दायभाग हिन्दू विधि के अनुसार दाय की दो पद्धतियाँ है-

(1) मिताक्षरा पद्धति एवं

(2) दायभाग पद्धति।

दायभाग-पद्धति बंगाल तथा आसाम में प्रचलित है और मिताक्षरा पद्धति भारत के अन्य प्रान्तों में प्रचलित है।

दोनों पद्धतियाँ मनु के इस कथन पर आधारित है कि “दाय सबसे निकट सपिण्ड और उसके बाद क्रम से सकुल्य, वेदाभ्यासी अथवा शिष्य को जाता है।” दायभाग में दाय का मुख्य आधार पारलौकिक हित का सिद्धान्त है, जब कि मिताक्षरा विधि में किसी खास आधार को नहीं अपनाया गया है।

मिताक्षरा में उपर्युक्त पाठ की व्याख्या में सबसे निकट रक्त सम्बन्धी को उत्तराधिकार के योग्य बताया गया है। अत: मिताक्षरा-पद्धति रक्त सम्बन्ध की निकटता पर आधारित मानी जा सकती है। यहाँ सपित्र्य (Agnate) सम्बन्धों को बन्धुओं की अपेक्षा अधिमान्यता प्रदान की जाती है। मिताक्षरा में दाययोग्य सम्पत्ति को दो भागों में विभाजित किया गया है-प्रथम, अप्रतिबन्ध दाय; द्वितीय, सप्रतिबन्ध दाय।

दायभाग-शाखा में भी मनु के पाठ के अनुसार सपिण्ड को दाय का आधार बताया गया है। किन्तु यहाँ सपिण्ड से तात्पर्य पिण्डदान करने वाले से है, अर्थात् जो मृतक को पिण्डदान कर सके। दूसरे शब्दों में, सपिण्ड वह है जो पिण्डदान दे और इस प्रकार मृतक पूर्वज को पारलौकिक लाभ कराये। यही पारलौकिक लाभ का सिद्धान्त दायभाग में दायभाग का आधार बनाया गया। दायभाग-शाखा में उपयुक्त दाय के दो विभाजनों को स्वीकार नहीं किया गया है तथा दाय को सप्रतिबन्ध दाय के रूप में ही स्वीकार किया गया है।

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इस प्रकार मिताक्षरा-विधि में दाय प्राप्त करने का आधार रक्त-सम्बन्ध है; जबकि दायभाग विधि में दाय प्राप्त करने का आधार पिण्डदान है। किन्तु मिताक्षरा-विधि में भी पिण्डदान की विचारधारा को पूर्णतया उपेक्षित नहीं किया जाता है। जहाँ रक्त-सम्बन्धियों के मध्य कोई संदेहास्पद मामला उत्पन्न हो जाता है वहाँ पिण्डदान की विचारधारा से सहायता ली जाती है। मिताक्षरा-विधि में सम्पत्ति के न्यागमन के लिए दो रीतियाँ अपनाई गयीं-उत्तरजीविता एवं उत्तराधिकार, जबकि दायभाग में सम्पत्ति के न्यागमन की केवल एक ही रीति है-उत्तराधिकार। उत्तरजीविता का अर्थ है कि किसी भी सम्पत्ति का न्यागमन, गत स्वामी के सहदायिकी सम्पत्ति पर, उसकी मृत्यु के पूर्व ही अधिकार प्राप्त करना। अर्थात् ऐसी सम्पत्ति में किसी पुरुष के उत्पन्न होते ही उसको उस सम्पत्ति में अपना हक प्राप्त हो जाता था जबकि उत्तराधिकार में किसी व्यक्ति की सम्पत्ति में उस व्यक्ति की मृत्यु के बाद ही स्वामित्व प्राप्त होता था।

  1. बुद्धा सिंह बनाम ललतू सिंह, 1915, पी० सी०701 (245)

मिताक्षरा-विधि के अन्तर्गत न्यागमन जैसा कि पूर्व उल्लिखित है, मिताक्षरा विधि में न्यागमन की दो रीतियाँ अपनायी गयी है-उत्तरजीविता (survivorship) तथा उत्तराधिकार (succession)। सम्पत्ति की प्रकृति के अनुसार न्यागमन निर्धारित किया जाता है। उत्तरजीविता का नियम संयुक्त परिवार की सम्पत्ति के सम्बन्ध में लागू होता है तथा उत्तराधिकार का नियम गत स्वामी की पृथक् सम्पत्ति के सम्बन्ध में।

सम्पत्ति की प्रकृति सम्पत्ति दो प्रकार की हो सकती है

(1) गत स्वामी की पृथक् सम्पत्ति, अथवा

(2) संयुक्त परिवार की सम्पत्ति।

निम्नलिखित रीति से प्राप्त की गई सम्पत्ति पृथक् सम्पत्ति मानी जाती है

(अ) सप्रतिबन्ध दायसाम्पाश्विक (collateral) से प्राप्त की हुई सम्पत्ति, अर्थात् भाई, भतीजा, चाचा आदि से प्राप्त सम्पत्ति सप्रतिबन्ध सम्पत्ति कहलाती है। जिस सम्पत्ति में किसी व्यक्ति का अधिकार जन्म से उत्पन्न नहीं होता, किन्तु गत स्वामी की सन्तानहीन मृत्यु के बाद अधिकार उत्पन्न होता है, उसे ‘सपतिबन्ध’ कहते हैं। इसे प्रतिबन्ध इसलिये कहा जाता है, क्योंकि सम्पत्ति का न्यागमन गत स्वामी के जीवन-काल में बाधित रहता है। दायभाग के अनुसार दाय सदैव सप्रतिबन्ध होता है।

(ब) दान (Gift)—प्रेम तथा स्नेह में पिता द्वारा दी गई कोई सम्पत्ति, चाहे वह पूर्वज की ही सम्पत्ति हो, पृथक् सम्पत्ति मानी जायेगी।

(स) सरकारी अनुदानसंयुक्त परिवार के किसी सदस्य को यदि सरकारी अनुदान प्राप्त हुआ है तो उसकी पृथक् सम्पत्ति होगी। किन्तु यदि अनुदान से यह प्रतिलक्षित होता है कि वह अनुदान पूरे परिवार के प्रलाभ के लिये है, तो वह पृथक् सम्पत्ति नहीं मानी जायेगी।

(द) पिता द्वारा दानयदि पिता इच्छापत्र द्वारा कोई अपनी पृथक् अथवा स्वार्जित सम्पत्ति किसी एक पुत्र को दे देता है तो वह उसकी पृथक् सम्पत्ति होती है।

(य) विवाह में प्राप्त दानकिसी व्यक्ति द्वारा विवाह में प्राप्त सम्पत्ति भी पृथक् सम्पत्ति समझी जाती है।

(२) वह सम्पत्ति जिसे परिवार खो चुका हैयदि पूर्वज की कोई सम्पत्ति परिवार द्वारा खो दी गई है और उस सम्पत्ति को परिवार का कोई सदस्य स्वयं बिना परिवार की सम्पत्ति लगाये हये उसको वापस ले लेता है तो वह सम्पत्ति उस सदस्य की पृथक् सम्पत्ति हो जाती है। यदि पिता ने वापस ली है तो वह पूरी सम्पत्ति का हकदार हो जायेगा, किन्तु यदि किसी सहदायिक ने पुनप्ति की है तो वह चल सम्पत्ति की ही दशा में उसका पूर्ण अधिकारी होगा। यदि अचल सम्पत्ति है तो सहदायिक उसको वापस लाने के प्रतिफल के रूप में उसमें 1/4 अंश का ही हकदार होगा।

(ल) पृथक् सम्पत्ति से प्राप्त आय।

(व) विभाजन से प्राप्त आय।

(श) पर्वज की सम्पत्ति जो अन्यसंक्रामण के बाद संयुक्त परिवार के किसी एक सदस्य ने स्वार्जित सम्पत्ति से पुन: खरीद लिया है।

(घ) अविभाज्य सम्पत्ति तथा उसकी बचत।

(स) पृथक् आमदनी से एकत्र सम्पत्तिा

(ह) अधिगम से प्राप्त लाभ (Gains of learning)।

1. श्री महन्त गोविन्द बनाम सीताराम, 21 इलाहाबाद 531

2. बाजवा बनाम त्र्यम्बक, (1910) 34 बा० 1061

3. कृष्णजी बनाम मरु महादेव, 15 बा० 321

4. बच्चू बनाम मन्कोर बाई, 31 बा० 3731

(क्ष) ऐसे एकमात्र उत्तरजीवी सहदायिक द्वारा अधिकृत सभी सम्पत्ति, जिसके कोई विधवा न हो। इन उपर्युक्त प्रकार की सम्पत्तियों के सम्बन्ध में उत्तराधिकार का नियम लागू होता है। दायभाग में उत्तराधिकार के नियम द्वारा ही सम्पत्ति का न्यागमन होता है।

अप्रतिबन्ध दाय-पूर्वजों से प्राप्त सम्पत्ति के सम्बन्ध में अप्रतिबन्ध दाय लागू होता है। इसके अन्तर्गत पुत्र, पौत्र एवं प्रपौत्र को, यदि कोई जीवित है तो, सम्पत्तिधारक के जीवन-काल में ही सम्पत्ति में एक अंश प्राप्त करने का हक उत्पन्न हो जाता है। दूसरे शब्दों में मृतक के जीवन-काल में ही पुत्र-पौत्रादि की सम्पत्ति में एक अधिकार निश्चित हो जाता है; किन्तु विभाजन हो जाने पर पुत्र का उत्तरजीविता से प्राप्त करने का अधिकार समाप्त हो जाता है।

यहाँ संयुक्त परिवार की सम्पत्ति से अभिप्राय सहदायिकी सम्पत्ति से है। इस प्रकार की सम्पत्ति को उसके स्रोत के अनुसार विभाजित किया गया है

(1) पूर्वजों की सम्पत्ति,

(2) किसी सहदायिक की पृथक् सम्पत्ति जो सामान्य सहदायिकी सम्पत्ति में सम्मिलित हो चुकी है |

उपर्युक्त दोनों प्रकार की सम्पत्तियों का न्यागमन उत्तरजीविता के सिद्धान्त के अनुसार होता है, अर्थात् जिस किसी व्यक्ति ने परिवार में जन्म लिया है, उसके जन्म लेने मात्र से उसका हक सम्पत्ति में हो जाता है। इसलिए इस प्रकार के न्यागमन को अप्रतिबन्ध दाय से उत्पन्न हुआ माना जाता है। उदाहरण के रूप में, “अ” अपने पिता से दायरूप में सम्पत्ति प्राप्त करता है। बाद में अ को पुत्र उत्पन्न हुआ। यह पुत्र अ की सम्पत्ति का जन्मतः सहदायिक हो जाता है तथा अपने पिता की सम्पत्ति में अपने पिता के साथ बराबर, अर्थात् आधे अंश का हकदार हो जाता है। यहाँ अ की सम्पत्ति अप्रतिबन्ध दाय है, क्योंकि अ का जीवन-काल उसकी सम्पत्ति में उसके पुत्र को हकदार होने से बाधित नहीं करता।

उपर्यक्त दृष्टान्त में “अ” को कोई पुत्र न होता और केवल भाई ही होता तो उस दशा में अ की सम्पत्ति सप्रतिबन्ध दाय होती, क्योंकि “अ” की सम्पत्ति में उसके जीवन-काल तक उसका भाई कोई हक नहीं प्राप्त कर सकता था। यहाँ “अ’ का जीवन-काल उसके भाई की सम्पत्ति को प्राप्त करने में एक बाधा थी।

यह अप्रतिबन्ध दाय तथा सप्रतिबन्ध दाय का भेद केवल मिताक्षरा विधि के अन्तर्गत मान्य है। दायभाग के अनुसार दाय सदैव सप्रतिबन्ध होता है।

दायभाग शाखा के अन्तर्गत न्यागमन-दायभाग शाखा के अन्तर्गत न्यागमन की एक ही रीति बताई गई है-वह है उत्तराधिकार। इस शाखा द्वारा उत्तरजीविता के नियम को संयुक्त परिवार की सम्पत्ति के सम्बन्ध में भी मान्य नहीं बताया गया। दायभाग में संयुक्त परिवार का सदस्य अपने अंश को पृथक् रूप में रखता है, अर्थात् गत स्वामी की मृत्यु के बाद सम्पत्ति उसके उत्तराधिकारियों को, चाहे वे पुरुष हों अथवा स्त्रियाँ, दायरूप में प्राप्त होती थी। उत्तरजीविता तथा उत्तराधिकार-उत्तराधिकार में किसी व्यक्ति की सम्पत्ति में उस व्यक्ति की मृत्यु के बाद ही स्वामित्व प्राप्त होता था। उस व्यक्ति की मत्य के पहले उसकी सम्पत्ति में कोई हक किसी को प्राप्त नहीं होता था, जब कि उत्तरजीविता में उत्तरजीवी को गत स्वामी की मृत्यु के पहले ही हक प्राप्त हो जाता है। गत स्वामी की मत्य से केवल एक हिस्सेदार ही कम होता है और जिसस उत्तरजीवी के पूर्व हक में अभिवृद्धि हो जाती है, न कि उसका कोई नया हक उत्पन्न हो जाता है।

  1. सूर्य प्रकाश राव बनाम गोविन्द राजुलु, (1957) 69 मद्रास ए० डब्ल्यू

(1) अ तथा ब दो भाई हिन्दू विधि की मिताक्षरा शाखा से प्रशासित संयुक्त परिवार के सदस्य हैं। अ एक पुत्री छोड़कर मर जाता है। संयुक्त परिवार की सम्पत्ति में अ का अंश उसके उत्तरजीवी भाई ब को चला जायेगा न कि उसकी पुत्री को; किन्तु यदि अ तथा ब पृथक् होते तो अ की सम्पत्ति उसकी पुत्री को दायरूप में प्राप्त होती न कि भाई को।

 (2) अ तथा ब दो भाई दायभाग-शाखा में प्रशासित संयुक्त तथा अविभक्त परिवार के सदस्य हैं। अ अपनी विधवा पत्नी तथा भाई को छोड़कर मर जाता है। यहाँ संयुक्त परिवार की सम्पत्ति में अ का अंश उसकी विधवा पत्नी को उत्तराधिकार द्वारा प्राप्त होगा न कि उसके भाई को।

मिताक्षरा विधि के अन्तर्गत सम्पत्ति का न्यागमन (पूर्व-विधि)-मिताक्षरा विधि से प्रशासित हिन्दू पुरुष की सम्पत्ति के न्यागमन की रीति को निर्धारित करने के लिए निम्नलिखित तथ्यों को ध्यान में रखना आवश्यक है-

(1) जहाँ मृतक अपनी मृत्यु के समय अविभक्त तथा संयुक्त परिवार का सदस्य है जिसको पारिभाषिक रूप से “सहदायिकी’ कहा जा सकता है, वहाँ उसका अविभक्त हक उसके सहदायिक की उत्तरजीविता के सिद्धान्त के अनुसार हिन्दू स्त्रियों के सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार अधिनियम के उपबन्धों को छोड़कर न्यागत होगा।

(2) (अ) यदि मृतक मृत्यु के समय संयुक्त परिवार का सदस्य था और उसने पृथक् भाग अथवा स्वार्जित सम्पत्ति छोड़ रखा है तो वह सम्पत्ति उत्तराधिकार से उसके उत्तराधिकारियों को चली जायेगी न कि सहदायिकों को।

(ब) यदि मृत्यु के समय मृतक एकमात्र उत्तरजीवी था, तो उसकी समस्त सम्पत्ति, जिसमें सहदायिकी सम्पत्ति भी शामिल है, उसके उत्तराधिकारियों के उत्तराधिकार में चली जाती थी।

(स) यदि मृतक मृत्यु के समय सहदायिकी से पृथक् था, तो उसकी समस्त सम्पत्ति उत्तराधिकार से उत्तराधिकारियों में चली जाती थी।

(3) यदि मृतक मृत्यु के समय पुनः संयुक्त हो गया है तो उस दशा में भी उसकी सम्पत्ति उत्तराधिकार से उत्तराधिकारियों में चली जाती थी। उत्तराधिकार का क्रम-मृतक के उत्तराधिकारियों में उत्तराधिकार निम्नलिखित क्रम से निर्धारित किया जाता था-

(1) सपिण्ड (विशेष अर्थ में) अर्थात् गोत्रज सपिण्ड,

(2) समानोदक,

(3) बन्धु,

(4) आचार्य,

(5) शिष्य तथा अन्त में

(6) राज्य।

दायभाग विधि के अन्तर्गत उत्तराधिकार

दायाभाग विधि के अन्तर्गत उत्तराधिकार के क्रम के सम्बन्ध में दो महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं-

(1) मृतक को पारलौकिक प्रलाभ देने की क्षमता,

1. कटमा नाचियार बनाम राज्य ऑफ शिवगौन, (1863) 9 एम० आई० ए० 5431

2. नागलक्ष्मी बनाम गोपूनादराज, (1856) 6 एम० आई० 2091

3. टेकैत दर्गा प्रसाद बनाम दुर्गा कुवाँरी, (1878) 4 कल० 1901

(2) उत्तराधिकार की एक ही रीति।

(1) मृतक को पारलौकिक प्रलाभ देने की क्षमतादायभाग विधि के अन्तर्गत उत्तराधिकार का वही अधिकारी हुआ करता था जिसको मृतक के लिए पारलौकिक प्रलाभ देने की धार्मिक क्षमता प्राप्त है। इस प्रकार दायभाग में दाय प्राप्त करने का आधार मृतक को पारलौकिक उपलब्धि कराना है। यहाँ पारलौकिक उपलब्धि से तात्पर्य मृतक का प्रवण श्राद्ध करना है। बारह प्रकार के श्राद्धों में प्रवण श्राद्ध को सबसे अधिक महत्व प्रदान किया जाता है। श्राद्ध करने वाला व्यक्ति तीन प्रकार से मृतक को वस्तुएँ अर्पित करता है-

(1) पिण्ड।

(2) पिण्डलेप (पिण्डलेप से तात्पर्य पिण्ड के उस अंश से है जो पिण्डदान के पश्चात् पिण्डदान करने वाले के हाथ में लगा रह जाता है)।

(3) जलदान।

पिण्डदान केवल सपिण्डों द्वारा ही दिया जाता है, पिण्डलेप सकुल्यों द्वारा तथा जलदान समानोदकों द्वारा दिया जाता है।

(2) उत्तराधिकार की एक ही रीति-दायभाग में उत्तराधिकार की केवल एक ही रीति बताई गई है। उत्तराधिकार का अधिकार न तो जन्मत: तथा न उत्तरजीविता से ही प्राप्त था। दाय का नियम इस बात से निर्धारित किया जाता था कि परिवार विभक्त था अथवा अविभक्त, संयुक्त सम्पत्ति थी अथवा पृथक्।

उत्तराधिकार के वर्ग मृतक को तीन प्रकार की वस्तुएँ देने के अनुसार दाय विधि में उत्तराधिकारियों का निर्धारण किया जाता था और इस प्रकार उत्तराधिकारियों को तीन कोटियों में विभाजित किया गया जो इस प्रकार थे

(1) सपिण्ड।

(2) सकुल्य।

(3) समानोदक।

इसके अतिरिक्त चौथी श्रेणी अवशिष्ट उत्तराधिकारियों की थी, जिनमें निम्नलिखित उत्तराधिकारी आते थे-

(अ) आचार्य।

(ब) शिष्य।

(स) सहपाठी।

(द) सम्पत्ति का राजगामी होना।।

दाय प्राप्त करने के लिए निर्योग्यताएँ

डॉ० जोली के अनुसार जो व्यक्ति कार्य करने के अयोग्य हो गये हैं, भौतिक, पारलौकिक अथवा नैतिक अयोग्यताओं के कारण वे दाय प्राप्त करने से अपवर्जित किये जाते हैं। दुष्कर्मों को करने वाला तथा जाति से च्युत व्यक्ति सामाजिक आधारों पर दाय प्राप्त करने से अपवर्जित किया जाता था। यह कहना कि दाय प्राप्त करने की निर्योग्यता धार्मिक भावनाओं पर आधारित थी, निराधार है।।

मनु का कहना है कि “नपुंसक, पतित, जन्मान्ध, बधिर, पागल, जड़, गूंगा तथा इन्द्रियशून्य व्याक्त सम्पत्ति में हिस्सा प्राप्त करने के अधिकारी नहीं होते।”1 अन्य स्मृतिकारों ने भा इसा

कार

1. अनंशौ क्लीवपतितौ जात्यन्धवधिरौ तथा उन्मत्तजड़मूकाश्च ये च काचिन्निरिन्द्रियाः।। मनु० 9।। 201।।

दाय प्राप्त करने को वियोग्यताको का उल्लेख किया है। मामय का कथन है कि जाति से बाहित तथा उसका ससक पुर रागल, जड असा असाथ रोग से पीड़ित व्यजित दाय नहीं प्राप्त कर सकते. किन्तु के भरण-पोषण के कारोह

कोई उतराधिकारी निम्नलिखित निर्योग्ताओ के आधार पर दे प्राप्त करने से अपराजित किया जाता था-

  • शारीरिक नियोग्यताको
  • मानसिक  नियोग्यसायो
  • नैतिक निर्योग्ताये
  • धार्मिक निर्योग्तायें
  • साम्या पर आधारित नियोग्यताको

1. शारीरिक नियोग्यताये के पास जे किसी शारीरिक नियोग्यता, जैसे-जन्मजात अन्धापन, जन्मजात बाधिरता, जन्मजात गंगापन को धारण करते है. वेदाय प्राप्त करने के अधिकारी नहीं होते। इसी प्रकार के अति जो जन्म से लंगडे अपना अंगहीन अथवा नपुंसक है या किसी ऐसे असाध्य व्याधि, जैसे- और एवं कृत्सित प्रकार के कह रोग आदि से पीड़ित होते है, दाय प्राप्त करने के अधिकारी नहीं होते उपजत सभी नियोग्यताये जब जन्मजात तथा असाध्य रूप से विद्यमान होती है तभी दाय प्राप्त करने में बाधक होती है। समस्त नियोग्यताये बाद में हिन्दु दाय (नियोग्यता निवारण) अधिनियम 1928 द्वारा समाप्त कर दी गई जिसके परिणामस्वरूप इन उपर्युक्त आधारों पर कोई व्यक्ति दाय से बचित नहीं किया जा सकता है।

2) मस्तिष्कीय नियोग्यतायें-इसके अन्तर्गत जन्मजात जड़ता एवं पागलपन आता है। पागलपन का जन्मजात अथवा असाध्य होना आवश्यक नहीं था। यदि कोई व्यक्ति दाय प्राप्त करने के समय पागल होता था तो वह दाद प्राप्त करने का अधिकारी नहीं रह जाता था। मिताक्षरा विधि में जन्मजात पागलपन जन्मना पिता को पैतृक सम्मति पर दाय-सम्बन्धी अधिकार को समाप्त कर देता था। जड़ता सदैव जन्मजात होती है। जड़ता अथवा पागलपन जब गम्भीर प्रकार की होती थी तभी कोई व्यक्ति दाय के अधिकार से वाचत होता था। हिन्दू दाद नियोग्यता निवारण अधिनियम, 1928 के अन्तर्गत पागलपन त्था जड़ता को निर्योग्यता के रूप में लागू होने के लिए उनका जन्मजात होना आवश्यक बना दिया गया।

(3) नैतिक निर्योग्यतायें इस प्रकार को नियोग्यता में स्त्री के असतीत्व होने की दशायें आती थीं। मिताक्षरा विधि में मृतक की विधवा पत्नी असाध्वी होने के आधार पर दाय प्राप्त करने से वंचित कर दी जाती थी। किन्तु मृत व्यक्ति की सम्पदा यदि एक बार विधवा में निहित हो जाती थी और वह पति की मृत्यु तक साध्वी रहती थी तो बाद को असाविता उसको उस सम्पदा से अनिहित कर देगी दायभाग में असाविता के आधार पर विधवा पत्नी, पुत्रियाँ एवं माता को भी दाय प्राप्त करने के अधिकार से वंचित कर दिया जाता था।

जहाँ एक अवयस्क विधवा पत्नी जो अपने मृत पति से दाय में सम्पदा प्राप्त कर लेती है और पति के भाई द्वारा इस उद्देश्य से असाध्वी होने के लिए प्रलुब्ध की जाती है जिससे वह उसको असाध्वी बनाकर स्वयं उसके मृत पति की सम्पदा का अधिकारी बन सके, न्यायालय ने यह निर्णय किया कि

  1. पतितस्तत् सतः क्लीव: पंगुरुन्मत्तको जडः। अन्थ्यो चिकित्सरोगाः भर्तव्यास्ते निरंशका।। याज्ञ०॥
  2. 2 फकीरनाथ बनाम कृष्णचन्द्र नाथ, ए० आई० आर० 1954 उड़ीसा 1761
  3. 3. बलदेव बनाम मथुरा, 33 इला० 7021
  4. 4. गजाधर बनाम ऐलू, 36, बा० 1381
  5. 5. रामानन्द बनाम रामकिशोरी, 22 कलकत्ता 3471

ऐसी परिस्थिति में वह सम्पदा का अधिकारी बनने से रोका जायेगा तथा उसको अपने निजी अपकार से लाभ उठाने का अवसर नहीं दिया जायेगा।

(4) धार्मिक निर्योग्यतायें-जब कोई व्यक्ति जाति से च्युत हो जाता था अथवा धर्म-परिवर्तन कर लेता था तो वह भी दाय प्राप्त करने से वंचित हो जाता था। इसके अतिरिक्त संसार को त्याग कर संन्यास अथवा वैराग्य ग्रहण करने की दशा में भी कोई व्यक्ति दाय नहीं प्राप्त कर सकता था। वस्तुत: संन्यास ग्रहण करने पर उस व्यक्ति की व्यावहारिक दृष्टि से मृत्यु मान ली जाती थी। किन्तु जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम, 1850 द्वारा जातिच्यत एवं धर्म-परिवर्तन के आधार पर उत्पन्न होने वाली निर्योग्यतायें समाप्त कर दी गयीं।

(5) साम्या पर आधारित निर्योग्यतायेंमतक की हत्या करने वाला व्यक्ति मृतक की सम्पत्ति में दाय प्राप्त करने का अधिकारी नहीं रह जाता। यदि मृतक की हत्या करने वाला हिन्दू-विधि के अन्तर्गत मृतक की सम्पत्ति में दाय प्राप्त करने के अयोग्य नहीं ठहराया गया है तो भी न्याय, साम्या एवं सद्विवेक के आधार पर वह इस प्रकार दाय प्राप्त करने के निर्योग्य करार दिया गया था। हत्या करने वाला व्यक्ति न तो स्वयं न उसके माध्यम से कोई अन्य व्यक्ति मृतक की सम्पत्ति में दाय प्राप्त करने का अधिकारी हो सकता है।

इस बात की अभिपुष्टि अभी हाल में वल्ली कानू बनाम आर० सिंगा पेरूमल के मामले में की गई। उपरोक्त मामले में अ ने अपने पिता की हत्या कर दी थी। हत्या करने के कारण वह अपने पिता की सम्पत्ति प्राप्त करने से वंचित हो गया था। उस सम्पत्ति को प्राप्त करने के लिये अ की पत्नी ङ्केने न्यायालय में इस बात के लिये वाद संस्थित किया कि वह अपने श्वसुर की ऐसी सम्पत्ति प्राप्त करने की अधिकारी है जो उसके पति को मिलना था। प्रस्तुत मामले में न्यायालय ने साम्या के आधार पर यह अभिनिर्धारित किया कि उसकी पत्नी व उसके माध्यम से अन्य कोई व्यक्ति मृतक की सम्पत्ति दाय में प्राप्त करने का अधिकारी नहीं होगा।

किन्तु हत्या करने वाले का पुत्र, यदि जन्म से ही मृतक की सम्पत्ति में हक रखता है तो ऐसी स्थिति में वह उत्तराधिकार प्राप्त करने के अयोग्य नहीं हो जाता। कोई व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति से भी दाय नहीं प्राप्त कर सकता था जिसके साथ उसके जीवन-काल में लड़ाई-झगड़ा करता रहा है तथा दुर्भावना रखता रहा है।

निर्योग्यता व्यक्तिगत होती थी। निर्योग्य व्यक्ति की औरस सन्तान दाय से वंचित नहीं होती थी। किन्तु जातिच्युत एवं हत्या करने वाले व्यक्तियों की सन्तान दाय एवं उसके माध्यम से दाय का दावा करने वाला व्यक्ति भी दाय से वंचित होते थे। निर्योग्य व्यक्ति का दत्तक-पुत्र केवल भरण-पोषण का अधिकारी होता था।

निर्योग्य व्यक्ति केवल दाय प्राप्त करने से वंचित होते थे। भरण-पोषण पाने का अधिकार उसका यथावत् बना रहता था। निर्योग्य व्यक्ति को दाय में प्राप्त होने वाली सम्पत्ति जिस व्यक्ति को मिलती थी, वह निर्योग्य व्यक्ति को भरण-पोषण देने का उत्तरदायी होता था।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 24 तथा 25 के अन्तर्गत दाय प्राप्त करने के लिए अपवर्जित करने के लिए कुछ आधारों का विवेचन किया गया है। धारा 28 में यह भी कहा गया है कि किसी रोग, दोष अथवा अंगहीनता के आधार पर कोई व्यक्ति दाय से अपवर्जित नहीं किया जायेगा।

1. चिन्दू बनाम मु० चन्दो, ए० आई० आर० 1951 शिमला 2021

2. ए० आई० आर० 2005 एस० सी०25871

3. नकछेद सिंह बनाम विजय बहादुर सिंह, ए० आई० आर० 1953 इला० 7591

4. मुकुन्दी बनाम जर्मनी, 73 आई०सी० 751

5. नकछेद सिंह बनाम विजय बहादुर सिंह, ए० आई० आर० 1953 इला० 7591

(व) उत्तराधिकार (हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956) (LLB Hindu Law Study Material)

परिचय-हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 ने उत्तराधिकार के सम्बन्ध में एक क्रान्तिकारी विचारधारा को जन्म दिया। यद्यपि न्यायिक निर्णयों के माध्यम से पूर्व हिन्दू विधि में महत्वपूर्ण परिवर्तनो की दिशा में प्रयास होते रहे हैं तथा अनेक बार उसमें परिवर्तन लाये गये, फिर भी आवश्यकता इस बात की बनी रही कि हिन्दू उत्तराधिकार की वर्तमान विधि को संहिताबद्ध किया जाये।

हिन्दुओं की सम्पत्ति-सम्बन्धी विधि में किसी न किसी प्रकार के सुधार की आवश्यकता बहुत पहले से ही अनुभव की जा रही थी। सन् 1937 में हिन्दू नारी के सम्पत्ति-सम्बन्धी अधिकार अधिनियम के पास हो जाने पर सरकार ने राव-कमेटी को इसी उद्देश्य से नियुक्त किया था। कमेटी ने हिन्द्र उत्तराधिकार विधि का अध्ययन करने के बाद यह निर्णय दिया कि हिन्दू नारी अथवा पुत्रियों के प्रति अन्यायपूर्ण विचारधारा को समाप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि इसमें सुधार लाये जायें तथा समस्त हिन्दू विधि संहिताबद्ध की जाय। किन्तु कमेटी का यह मत था कि विधि को संहिताबद्ध धीरे-धीरे किया जाय जिससे विधि में आधुनिकता को उचित रूप से नियोजित किया जा सके।

राव-कमेटी के द्वारा स्वीकृत नीति के आधार पर अनेक अधिनियम पास किये गये जिनमें हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 सबसे महत्वपूर्ण अधिनियम है। सुधारवादी दृष्टिकोण को चरम सीमा का उदाहरण हमें इस अधिनियम में प्राप्त है।

उद्देश्य-हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 वस्तुत: एक प्रगतिशील समाज को आवश्यकताओ तथा माँग को पूरा करने के लिए पास किया गया। पूर्व हिन्दू विधि अनेक पाठो तथा न्यायिक निर्णयों पर आधारित होने के कारण ग्राह्य नहीं रह गयी थी। इसीलिये आवश्यकता इस बात की थी कि विधि की एक सर्वमान्य पद्धति अपनायी जाय जो समस्त सम्प्रदाय के हिन्दुओं के लिए ग्राह हो तथा सभी के लिये समान रूप से अनुवर्तनीय हो। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए इस अधिनियम का जन्म हुआ। इस अधिनियम में पुरुष तथा स्त्रियों में पूर्वप्रचलित असमानता को दूर करके उत्तराधिकारियो को एक सूची प्रदान की गई जो अत्यन्त ही न्यायसंगत है। इस अधिनियम को उत्तराधिकार से सम्बन्धित विधि में संशोधन एवं परिवर्तन लाने के लिए पास किया गया।

अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ–(1) अधिनियम सभी हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिक्ख के लिये लाग होता है। यह उन व्यक्तियों के लिये भी अनुवर्तनीय है जिनके पिता-माता मे कोई एक हिन्दू बौद्ध, जैन अथवा सिक्ख है।

(2) अधिनियम ऐसे व्यक्तियों की सम्पत्ति के लिए भी लागू नहीं होता, जिनके विवाह के लिये विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के उपबन्ध लागू होते है।

(3) अधिनियम मिताक्षरा सहदायिकी सम्पत्ति के लिए भी लागू नहीं होता, यदि सहदायिक अनसची (1) में उल्लिखित किसी स्त्री नातेदार अथवा ऐसे खी नातेदार के माध्यम से दावा करने वाले प) नातेदार को छोड़कर मरता। यह उल्लेखनीय है कि मिताक्षरा सहदायिकी सम्पत्ति की पुरी भाग अधिनियम की धारा 6 से प्रभावित हुई है। यदि अनुसूची के वर्ग (1) में उल्लिखित आठ धिकारियों में से एक को छोड़कर कोई हिन्दू मर जाता है तो उसका सहदायिकी अंश मीलिता के आधार पर नहीं वरन् इस अधिनियम के अनुसार न्यागत होगा जिसके अन्तर्गत खो यादों को समान अंश प्राप्त करने का अधिकार होगा। वस्तुतः मिताक्षरा सहदायिकी का न ही धारा 6 के द्वारा समाप्त कर दिया गया है। मिताक्षरा सहदायिकी सम्पत्ति का ता के सिद्धान्त के अनुसार केवल पुरुष दायादो में ही होता था, किन्तु अब प्रस्तुत नत स्त्री नातेदार को भी उसमें हक प्रदान कर दिया गया है।

(4) उत्तराधिकार का क्रम, प्रेम तथा स्नेह के आधार पर निश्चित किये गये। पूर्व विधि के अन्तर्गत उल्लिखित रक्त-सम्बन्ध अथवा पिंडदान के आधार पर उत्तराधिकारी निश्चित करके का नियम, जो

मिताक्षरा तथा दायभाग शाखाओं में प्रचलित था, समाप्त कर दिया गया।

(5) अधिनियम में अधिमान्यता के बहुत सरल नियम अपनाये गये तथा जहाँ अधिमान्यता नहीं निर्धारित की जा सकती है, वहाँ उत्तराधिकारी एक ही साथ सम्पत्ति ग्रहण करते हैं।

(6) अधिनियम में दूर के भी सपित्र्यों एवं साम्पार्शिवकों को उत्तराधिकारी बनने का अवसर प्रदान किया गया। सपित्र्यों तथा सांपाश्विकों में उत्तराधिकार का क्रम डिग्री के अनुसार निर्धारित किया गया।

(7) एक हिन्दू पुरुष की सम्पत्ति के सम्बन्ध में उत्तराधिकार का एक समान क्रम प्रदान किया गया। कुछ परिवर्तन मरुमक्कत्तायम तथा अलियसन्तान विधि में लाये गये।

(8) दक्षिण की मातृ-प्रधान पद्धति में प्रचलित उत्तराधिकार से सम्बन्धित विभिन्न अधिनियमों को इस अधिनियम के अन्तर्गत निरस्त कर दिया गया है।

(9) अधिनियम में हिन्दू नारी की सीमित सम्पदा की विचारधारा को समाप्त कर दिया गया। जो भी सम्पत्ति अब किसी नारी को दाय में अथवा किसी भी वैध तरीके से प्राप्त होगी अथवा समस्त सम्पत्ति जो इस अधिनियम में लागू होने के दिन उसके आधिपत्य में होगी उन पर उसको पूर्ण स्वामित्व प्रदान कर दिया गया।

(10) हिन्दू नारी की पूर्ण सम्पत्ति के सम्बन्ध में उत्तराधिकार का एक समान क्रम प्रदान किया गया। यदि कोई स्त्री सम्पत्ति छोड़कर निर्वसीयत मरती है, तो उसकी सन्तान उसकी प्राथमिक उत्तराधिकारी होगी, उसके बाद पति तथा पिता-माता क्रम से होंगे। सन्तान न होने पर उसकी वह सम्पत्ति जो पिता से प्राप्त की गई थी, पिता को अथवा पिता के दायादों को चली आयेगी तथा पिता एवं श्वसुर से प्राप्त सम्पत्ति पति को अथवा उसके दायादों को प्राप्त हो जायेगी।

(11) सहोदर अथवा सगे सम्बन्धी सौतेले अथवा चचेरे सम्बन्धी को अपवर्जित करेंगे।

(12) जहाँ दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी निर्वसीयती सम्पत्ति में उत्तराधिकार प्राप्त करते हैं, वे अपने अंश को व्यक्तिपरक न कि पितापरक रीति से सह-आभोगी के रूप में प्राप्त करेंगे।

(13) जहाँ किसी व्यक्ति की निर्वसीयती सम्पत्ति दो या दो से अधिक उत्तराधिकारियों को न्यागत होती है और उनमें से कोई एक व्यक्ति उस प्राप्त सम्पत्ति को बेचना चाहता है, तो दूसरे उत्तराधिकारी को यह अधिकार प्राप्त है कि वह उन व्यक्तियों की अपेक्षा उस सम्पत्ति की प्राप्ति में अधिमान्य समझा जाय। इस प्रकार अधिनियम के पूर्वक्रय (pre-emption) का अधिकार मान्य समझा गया। (धारा 22)।

(14) अधिनियम में विधवा, अविवाहिता स्त्री तथा पति द्वारा परित्यक्त अथवा पृथक् हुई स्त्री को अपने पिता के घर में रहने का अधिकार प्रदान किया गया है।

(15) रोग, दोष तथा अंगहीनता किसी व्यक्ति को दाय प्राप्त करने से अपवर्जित नहीं करती। दाय अपवर्जन के आधार पर अब बदल दिये गये हैं। किसी व्यक्ति की हत्या करने वाला उस हत व्यक्ति की सम्पत्ति को उत्तराधिकार में पाने से अपवर्जित कर दिया गया है। इसी प्रकार विधवा स्त्री यदि उत्तराधिकार के अधिकार के प्रारम्भ होने के दिन पुनर्विवाह कर लेती है तो वह भी उत्तराधिकार के निर्योग्य हो जाती है। इसी प्रकार धर्म-परिवर्तन किये हुए हिन्दू का वंश भी दाय प्राप्त करने के निर्योग्य हो जाता है।

(16) अधिनियम के अनुसार कोई भी हिन्दू (पुरुष) सहदायिकी सम्पत्ति में अपने हक को वसीयत द्वारा हस्तान्तरित कर सकता है।

अधिनियम का क्षेत्र तथा विस्तार-भारत के सभी हिन्दुओं के लिये यह अधिनियम लागू किया गया है। भारत के रहने वाले हिन्दुओं के सम्बन्ध में अन्तर्राष्ट्रीय विधि के नियम लागू होते हैं। न्यायालय इस अधिनियम के क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले सभी हिन्दुओं के सम्बन्ध में इसके नियमों को लागू करेंगे।

कुछ पदों की व्याख्या अधिनियम की धारा 3 के अनुसार निम्नलिखित ढंग से की जा सकती है-

सपित्र्य तथा बन्धु (Agnate and Cognate)–सपित्र्य वह व्यक्ति होता है जो (1) रक्त से सम्बन्धित होता है, या (2) दत्तक ग्रहण से सम्बन्धित होता है, किन्तु (3) पूर्णतया पुरुष वर्ग से सम्बन्धित होता है; जब कि बन्धु वह व्यक्ति होता है जो (1) रक्त से सम्बन्धित होता है, अथवा (2) दत्तक-ग्रहण से सम्बन्धित होता है किन्तु (3) पूर्णतया पुरुष वर्ग से सम्बन्धित नहीं होता। सपित्र्य से सम्बन्धित पसल तथा स्त्री हो सकते हैं और यही बात बन्धु के साथ भी लागू होती है। जहाँ कोई व्यक्ति मृतक से एक अथवा एक से अधिक स्त्रियों के द्वारा सम्बन्धित होता है, उसको बन्धु कहा जाता है। बन्ध पर्णतया स्त्रियों के द्वारा अनिवार्य रूप से सम्बन्धित नहीं होता। इस प्रकार पुत्र के पुत्री का पुत्र अथवा पुत्री. बहन का पुत्र अथवा पुत्री, माता के भाई का पुत्र बन्धु होते हैं जबकि पिता, पितामह इत्यादि चाचा. चाचा का पुत्र बन्धु श्रेणी में, पुत्र, पौत्र वंशज श्रेणी में सपित्र्य होते हैं।

प्रथायें तथा रूढ़ियाँइन पदों का प्रयोग अधिनियम में जहाँ कहीं किया गया है, वह उसी अर्थ में किया गया है जिस अर्थ में हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 में किया गया है। प्रथायें प्राचीन, निश्चित तथा न्यायसंगत होनी चाहिये।

इस सम्बन्ध में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने यह सम्प्रेक्षित किया कि यदि अनुसूचित जनजाति के बीच उत्तराधिकार के सम्बन्ध में प्रथायें मौजूद हों और वह अपनी प्रथा के अन्तर्गत ही सम्पत्ति का बँटवारा करते हों वहाँ इस अधिनियम के प्रावधान उनके बीच लागू नहीं होंगे।

उत्तराधिकारी-उत्तराधिकारी से तात्पर्य उन व्यक्तियों से है जो इस अधिनियम के अन्तर्गत किसी निर्वसीयती सम्पत्ति को उत्तराधिकार में प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

निर्वसीयती-कोई व्यक्ति निर्वसीयती सम्पत्ति को छोड़कर मरा हुआ माना जाता है यदि उसने अपनी सम्पत्ति का वसीयती निर्वर्तन नहीं किया है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी सम्पत्ति को वसीयती निर्वर्तन करने का अधिकार रखता है। वसीयती निर्वर्तन करने पर सम्पत्ति इच्छापत्र के अनुसार न्यागत होती है। यदि इच्छापत्र किसी अवैध उद्देश्य से लिखा गया है तो वह विधि द्वारा बाध्यकारी प्रभाव नहीं रखेगा। अत: आवश्यकता इस बात की है कि इच्छापत्र प्रभावकारी हो अन्यथा इच्छापत्र के शून्य होने पर वह व्यक्ति निर्वसीयती सम्पत्ति छोड़कर मरा हुआ समझा जायेगा।

सम्बन्धित सम्बन्धित से अर्थ है कि वैध बन्धुता से सम्बन्धित बन्धुता जो रक्त से अथवा (हिन्दू विधि में) दत्तक-ग्रहण से स्थापित होती है। इस परिभाषा के साथ एक उपबन्ध है, अवैध सन्तान केवल माता से ही सम्बन्धित मानी जाती है तथा वे एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं तथा उनकी वैध सन्तान माता-पिता दोनों से सम्बन्धित मानी जाती है। अवैध सन्तान अपने पिता की सम्पत्ति की उत्तराधिकारिणी किसी भी दशा में नहीं हो सकती। माता ही उसका वंशक्रम मानी जाती है तथा उससे ही सम्बन्ध प्रतिष्ठित होता है। अवैध सन्तानों का सम्बन्ध केवल एक ही पीढ़ी तक माना जाता है, उसका उससे अधिक पीढ़ी के पूर्वजों के साथ कोई सम्बन्ध नहीं माना जाता। उनका अपनी माता, बहन तथा भाई के साथ का सम्बन्ध बना रहता है।

अलियसन्तान विधि-अलियसन्तान विधि का तात्पर्य उस विधि से है जो उन व्यक्तियों पर लाग होती है जो यदि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम न पारित हुआ होता तो मद्रास अलियसन्तान अधिनियम, 1949 द्वारा अथवा प्रथागत विधि द्वारा उन विषयों के सम्बन्ध में प्रशासित होते जिनके लिए उत्तराधिकार अधिनियम में उपबन्ध किया गया है। यह विधि मातृ-पक्ष प्रधान विधि है जो दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में प्रचलित है। इसमें दाय का अधिकार माता के सम्बन्ध के अधिकार पर निर्भर करता था। उत्तराधिकार अधिनियम ने इस विधि को अत्यधिक सीमा तक प्रभावित किया है। 1. श्रीमती बुटकी बाई बनाम सुखवती व अन्य, ए० आई० आर० 2014 छत्तीस० 110.

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