LB Hindu Law Chapter 8 Post 1 Book Notes Study Material PDF Free Download

LLB Hindu Law Chapter 8 Post 1 Book Notes Study Material PDF Free Download : Hello Friends आज की इस पोस्ट में आप सभी अभ्यर्थी LLB Hindu Law Books Notes Study Material Part 2 अन्धिनिय्मित पूर्व हिन्दू विधि Chapter 8 संयुक्त परिवार तथा मिताक्षरा सह्दायिकी सम्पत्ति Post 1 पढ़ने जा रहे है जिसे आप Free PDF Hindi and English Language में Download भी कर सकते है | अभ्यर्थियो को निचे LLB 1st, 2nd, 3rd year Notes Free PDF में दे रहे है जहाँ से आप LLB All Semester Books Free PDF Download कर सकते है |

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भाग 3 अनधिनियमित पूर्व हिन्दू विधि (Hindu Law Notes)

अध्याय 8 संयुक्त परिवार तथा मिताक्षरा सहदायिकी सम्पत्ति (Hindu law Books PDF)

संयुक्त परिवार : प्रकृति एवं संगठन संयुक्त परिवार हिन्दुओं की एक अति प्राचीन संस्था है जो हिन्दू-समाज के लिये एक विशेष बात है। अति प्राचीन काल से हिन्दू संयुक्त परिवार में रहने के अभ्यस्त थे। संयुक्त परिवार की परिभाषा में वे सभी व्यक्ति आते हैं जिनसे परिवार निर्मित होता है। इस प्रकार एक समान पूर्वज से उत्पन्न हुये व्यक्ति तथा उनकी पत्नियाँ एवं अविवाहित पुत्रियाँ संयुक्त परिवार की सदस्या मानी जाती हैं। पुत्री विवाहित होने पर अपने पिता के परिवार की सदस्या नहीं रह जाती अपितु वह अपने पति के परिवार की सदस्या हो जाती है। एक संयुक्त परिवार के विषय में कहा जाता है कि संयुक्त सम्पदा उसका आवश्यक लक्षण नहीं है। किसी सम्पदा के रहने पर भी परिवार संयुक्त हो सकता है। सामान्यतः हिन्दू परिवार संयुक्त होता है, न केवल सम्पदा के सम्बन्ध में वरन् उपासना तथा भोजन के सम्बन्ध में भी।

मिताक्षरा विधि में सम्पत्ति का होना संयुक्त परिवार का आवश्यक लक्षण नहीं है। किन्तु जहाँ लोग संयुक्त रूप में रहते हैं तथा संयुक्त रूप से भोजन करते और उपासना करते हैं, वहाँ यह धारणा बनाना न्यायसंगत नहीं प्रतीत होता है कि उनके पास कोई सम्पत्ति नहीं है। मिताक्षरा विधि में संयुक्त परिवार की एक उपधारणा मानी जाती है। परिवार की समस्त सम्पत्ति संयुक्त सम्पत्ति होती है।

संयुक्त हिन्दू परिवार उन सभी पुरुष सदस्यों से जो एक समान पूर्वज की सन्तान हैं तथा उनकी माता, पत्नी अथवा विधवा तथा अविवाहित पुत्रियों से निर्मित होता है, यह सपिण्डता के मूल सिद्धान्त पर आधारित होता है। विशिष्ट पारिवारिक सम्बन्ध इस संस्था की विशेषता है। यह संस्था विधि की रचना है जो उन अवस्थाओं को छोड़कर जिनमें दत्तक-ग्रहण तथा विवाह के द्वारा संयुक्त परिवार का निर्माण होता है, अन्य किसी दशा में सदस्यों की कृतियों से निर्मित नहीं हो सकता।

श्रीमती संध्या रानी दत्ता बनाम आयकर अधिकारी, बिहार के मामले में अपीलार्थी दाय भाग शाखा की एक हिन्दू विधवा थी जो कि अपनी दो पुत्रियों के साथ अपने पति की स्वअर्जित सम्पत्ति की बराबर की हिस्सेदार थी। मृतक पिता एवं उनकी पुत्रियों ने सन् 1973 में पारस्परिक करार द्वारा एक संयुक्त हिन्दू परिवार का गठन किया। सम्पत्ति के विभाजन के पश्चात् विधवा ने उत्तराधिकार में प्राप्त अपने हिस्से को संयुक्त हिन्दू परिवार में समाहित कर दिया। इस घोषणा के पश्चात् विधवा ने अपनी सम्पत्ति आयकर की संगणना हेतु नहीं किया जिससे आयकर अधिकारियों ने उसे ऐसा न करने

1. रघनन्दन बनाम ब्रज किशोर, 33 आई० ए० 530; आयकर आयुक्त बनाम सरजीत सिंह, ए० आई०

आर० 1976 एस० सी० 1091

2. करसनदास बनाम गंगाबाई, 32 बा० 479; गोवली पुदन्ना बनाम कमिश्नर ऑफ इन्कम टैक्स, (1966) 60 आई०टी० आर० 293 (एक संयुक्त परिवार केवल एक पुरुष सदस्य तथा मृत पुरुष सदस्यों की विधवाओं द्वारा निर्मित हो सकता है

3. सुदर्शन बनाम नरसिंहलु, 25 म० 149; अब्राहम बनाम अब्राहम, 9 एम० आई० ए० 1951

4.देखें टाइम्स ऑफ इण्डिया (लखनऊ) दिनांक 2/03/20011

के लिये दोषी पाया. विधवा ने उक्त आदेश के विरुद्ध एक अपील उच्च न्यायालय में दायर किया जिसमें उच्च न्यायालय ने विधवा के पक्ष में निर्णय देते हये कहा कि वह विधवा परिवार में अन्य महिला उत्तराधिकारी के साथ संयुक्त हिन्दू परिवार का गठन कर सकती है परन्तु इस निर्णय के विरुद्ध की गयी अपील को उच्चतम न्यायालय ने पटना उच्च न्यायालय के निर्णय को अस्वीकार करते हुये यह अभिनिर्धारित किया कि हिन्दू विधि में महिला उत्तराधिकारी द्वारा करार के माध्यम से संयुक्त हिन्दू परिवार का निर्माण हिन्दू विधि के मौलिक नियमों से सर्वथा विपरीत होगा अतः जहाँ पुरुष सदस्य का अभाव है वहाँ संयुक्त हिन्दू परिवार का निर्माण नहीं किया जा सकता।

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संयुक्त हिन्दू परिवार के लिये यह आवश्यक है कि उसमें कम से कम दो व्यक्ति हो अर्थात् एक अविवाहित पुरुष भी हिन्दू संयुक्त परिवार की स्थापना नहीं कर सकता। यदि संयुक्त परिवार की सम्पत्ति विभाजित की जाती है तो विभाजन के उपरान्त प्राप्त सम्पत्ति उसकी स्व-अर्जित सम्पत्ति मानी जायेगी न कि संयुक्त परिवार की सम्पत्तिा लेकिन जहाँ संयुक्त परिवार की सम्पत्ति में किसी एक सहदायिक को ऐसी सम्पत्ति पट्टे पर दे दिया जाता है जो उसे व्यक्तिगत तौर नहीं दी गई है, यदि ऐसा संयुक्त परिवार विभाजित होता है तो उस स्थिति में पट्टे पर दी गई सम्पत्ति संयुक्त परिवार की सम्पत्ति में सम्मिलित हो जायेगी और वह सम्पत्ति उन सदस्यों के बीच विभक्त हो जायेगी जो उस परिवार के सदस्य है।

पुरुष

संयुक्त परिवार के सदस्य-संयुक्त परिवार में निम्नलिखित सदस्य सम्मिलित है-

(1) वे पुरुष जो पुरुष वंशानुक्रम में आते है.4

(2) साम्पाश्विक

(3) दत्तक-ग्रहण से सम्बन्धित

(4) दीन आश्रित, तथा

(5) यह उन पुत्रों को भी सम्मिलित करता है जो विशेष विवाह अधिनियम के अन्तर्गत एक हिन्दू पुरुष तथा ईसाई माता से उत्पन्न हुए हैं।

स्त्री

(1) पुरुष सदस्यों की पत्नी एवं विधवा पत्नी, तथा

(2) उसकी कुमारी पुत्रियाँ।

संयुक्त परिवार की एक यह भी विशेषता है कि इसमें अवैध सन्ताने भी सम्मिलित मानी जाती है। वे अपने पिता के परिवार की सदस्य मानी जाती है। कभी-कभी विधवा (विवाहित) पुत्रियाँ, जो पिता के परिवार में आकर रहने लगती है, संयुक्त परिवार की सदस्या मान ली जाती हैं और उन्हें भरण-पोषण का हक उत्पन्न हो जाता है।

परिवार की संयुक्तता-सम्बन्धी उपधारणा-यह एक सामान्य उपधारणा हिन्दुओं के परिवार के बारे में होती है कि वे संयुक्त है। यह संयुक्तता (Jointers) खान-पान, पूजा-अर्चना एवं सम्पत्ति के सब में होती है। इस प्रकार की उपधारणा निकट के सम्बन्धियों के बीच में ही होती है जैसे भाइयों

2.. मी० कष्ण प्रसाद बनाम आयकर आयुक्त, (1974) 97 आई०टी० आर० 493 (एस० सी०।

3. अमतलाल बनाम महरानी व अन्य, ए० आई० आर० 2009, एस० सी०29311

4.10 बाम्बे एल० आर० 1481

5. चौधरी गणेशदत बनाम जीवक, 311 आई०ए०1071

6.रोमा मारिय बनाम सी०टी० कमिश्नर, ए० आई० आर० 1970 मद्रास 2401

के बीच, पिता पुत्र के बीच।’ उड़ीसा उच्च न्यायालय ने यह कहा कि यह सामान्य बात है कि प्रत्येक हिन्दू परिवार संयुक्त माना जाता है। एक हिन्दू परिवार में जब तक विपरीत साबित न किया जाय परिवार संयुक्त बना हुआ समझा जाता है। यदि कोई पुराना विभाजन का तर्क लेता है तो उसे यह साबित करना पड़ेगा कि पुराने समय में विभाजन हुआ था। निम्नलिखित प्रमुख उपधारणों से यह निर्धारित किया जा सकता है कि परिवार संयुक्त है अथवा विभाजित, कोई सम्पत्ति संयुक्त परिवार की सम्पत्ति है या किसी विशेष सहदायिक की

(1) प्रत्येक हिन्दू परिवार के विषय में यह उपधारणा है कि सम्पदा, उपासना तथा भोजन के सम्बन्ध में वह संयुक्त है, अत: प्रमाण-भार उस व्यक्ति के ऊपर होता है जो विभाजन का तर्क प्रस्तुत करता है। परिवार के सदस्य अलग-अलग निवास-गृह में रह सकते हैं अथवा भोजन पृथक् रूप से कर सकते हैं, फिर भी वे सम्पदा के सम्बन्ध में संयुक्त रह सकते हैं। यद्यपि पृथक् निवास तथा भोजन परिवार के विभाजन का अन्तिम प्रमाण नहीं है। फिर भी यह एक ऐसा तथ्य है जो विभाजित होने की स्थिति में निश्चित करने में अत्यधिक सहायक होता है। परिवार के एकीकृत होने की उपधारणा परिस्थितियों के परिवर्तन के अनुसार बदलती रहती है। यदि मामला भाइयों के बीच में है, तो यह उपधारमा सबल होती है कि परिवार संयुक्त है, किन्तु यदि मामला चचेरे भाइयों के बीच अथवा अन्य भाइयों या इसी प्रकार के सम्बन्धियों के बीच में है तो उपधारणा सबल नहीं होती है।

(2) कोई परिवार यदि एक बार संयुक्त हुआ मान लिया जाता है अथवा उसके संयुक्त होने का प्रमाण प्राप्त हो जाता है तो विभाजन के अभाव में, वह संयुक्त मान लिया जाता है। सगे भाइयों के सम्बन्ध में एक दृढ़ उपधारणा होती है कि वे संयुक्त होंगे। यह साबित करना कि वे संयुक्त हिन्दू परिवार की संरचना नहीं करते, उसके ऊपर है जो उसके संयुक्त न होने की बात कहता है।

(3) जब यह सिद्ध किया जाता है अथवा मान लिया जाता है कि विभाजन सम्पन्न हो चुका है तो जो व्यक्ति सम्पत्ति के संयुक्त होने की बात करता है, उसे सिद्ध करने का प्रमाण-भार उसी पर होता है।

(4) जहाँ यह सिद्ध किया जाता है कि परिवार संयुक्त है अथवा उसमें सम्पत्ति संयुक्त है, तो यह उपधारणा निर्मित की जाती है कि सभी सम्पत्ति जो परिवार के पास है, संयुक्त है; किन्तु इस तथ्य से कि परिवार संयुक्त है, यह उपधारणा नहीं बनायी जा सकती है कि उसके पास संयुक्त सम्पत्ति अथवा कोई सम्पत्ति है।

प्रमाण-भारजब यह प्रमाणित कर दिया जाता है कि पूरा परिवार एक ही निवास-गृह में संयुक्त रूप से रहता है, तो जो व्यक्ति उसके विभाजित होने का दावा करता है, प्रमाण-भार उसी व्यक्ति पर होता है; किन्तु इससे सम्बन्धित विधि परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है। अत: प्रत्येक परिस्थिति को सन्नियन्त्रित करने के लिए विधि का कोई एक साक्ष्य स्थापित नहीं किया जा सकता।

जहाँ किसी विशेष सम्पत्ति को अर्जित करने की तिथि को संयुक्त परिवार के पास पर्याप्त साधन था, वहाँ पर किसी एक सदस्य के नाम से उसके होने पर यह उपधारणा निर्मित की जाती है कि वह परिवार के संयक्त कोश से अर्जित की गई है। अत: वह संयुक्त परिवार की सम्पदा है जब तक कि उसके विपरीत न सिद्ध कर दिया जाय। परिवार के सभी सदस्यों के व्यक्तिगत नाम में जो सम्पत्ति

1. इन्द्रनारायण बनाम रूप नारायण, ए० आई० आर० 1971 एस० सी० 1962; देखें पुष्पलता एन० सी० बनाम वी० पद्मा, ए० आई० आर० 2010 कर्नाटक 1241

2. राधामनी भुइयन बनाम दिवाकर भुइयन, ए० आई० आर० 1991 पटना 951

3. मोहेन्द्र राउत बनाम मोहन्दी देई, ए० आई० आर० 1985 उड़ीसा एन० ओ० सी० 601

4. भारत सिंह बनाम भगीरथी, ए० आई० आर० 1966 एस० सी० 4051

5. के० बी० नारायन स्वामी अय्यर बनाम के० बी० रामकृष्ण अय्यर, ए० आइ° सी०2891

अर्जित की गई रहती है, वह संयुक्त सम्पत्ति नहीं निर्मित करती। जो कोई सदस्य ऐसी अर्जित सम्पनि को संयुक्त परिवार की सम्पत्ति घोषित करता है उसको सम्पत्ति का केन्द्र बिन्दु प्रमाणित करना पड़ेगा। जहाँ वह यह साबित नहीं कर सकता, उपधारणा उसके विपरीत होगी। _संयुक्त परिवार का प्रबन्ध–संयुक्त परिवार के कार्यों का प्रबन्ध परिवार का ज्येष्ठ सदस्य करता है जिसको प्रबन्धक अथवा कर्त्ता कहते हैं। यदि पिता जीवित है तो साधारणतः वही संयुक्त परिवार का कर्ता होता है। वह परिवार का प्रतिनिधि माना जाता है तथा प्रबन्ध के मामले में सर्वोच्च है। इस सम्बन्ध में यह भी एक उपधारणा है कि परिवार का सबसे ज्येष्ठ सदस्य ही संयुक्त परिवार का कर्ता माना जायेगा।

संयुक्त परिवार की सम्पत्ति का उपभोग-हिन्द मिताक्षरा संयुक्त परिवार के प्रत्येक सदस्य को कुछ निश्चित अधिकार, जैसे—(1) भरण-पोषण तथा निवास का अधिकार, (2) विभाजन का अधिकार, (3) परिवार के लेखा-जोखा का विवरण माँगने का अधिकार तथा (4) संयुक्त कब्जा तथा भोग का अधिकार

प्यूनिसपल कार्पोरेशन ग्वालियर बनाम पूरन सिंह, के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह निश्चित किया कि संयुक्त हिन्दू परिवार की सम्पत्ति के अन्तर्गत सभी सहभागियों की सम्पत्ति संयुक्त होती है और ऐसी सम्पत्ति में उन सभी का संयुक्त कब्जा तथा भोग का अधिकार प्राप्त होता है जो किसी साक्ष्य के माध्यम से सिद्ध किया जा सकता है कि ऐसी सम्पत्ति में सभी सहभागियों का समान रूप से कब्जा मौजूद है

हिन्दू सहदायिकी वस्तृतः एक हिन्दू सहदायिकी संयुक्त परिवार की अपेक्षा एक छोटी संस्था है। यह केवल उन्हीं सदस्यों को सम्मिलित करती है जिनको जन्म से संयुक्त अथवा सहदायिकी सम्पत्ति में हक प्राप्त होता है। उच्चतम न्यायालय ने भी नरेन्द्र बनाम डब्ल्यू० टी० कमिश्नर के वाद में यह निरूपित किया है कि हिन्दू सहदायिकी एक लघु संगठन है जिसमें सहदायिकी सम्पत्ति में हक रखने वाले वे पुरुष सन्तान आते हैं जो तीन पीढ़ी तक के वंशानुक्रम में हैं।

समान पुरुष पूर्वज से पुरुष-वंशानुक्रम में उत्पन्न हुये तीन पीढ़ी तक के सदस्य सहदायिकी निर्मित करते हैं। प्रत्येक सहदायिकी एक समान पूर्वज से प्रारम्भ होती है जिसमें उसकी मृत्यु के बाद साम्पाश्विक भी आ जाते हैं। इसका कारण हिन्दू-धर्म है जिसके अनुसार तीन पीढ़ी तक के ही वंशज अपने पूर्वज को धार्मिक प्रलाभ अर्पित कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त केवल पुरुष-वंशानुक्रम से उत्पन्न हुये सदस्य सहदायिक हो सकते हैं। खियाँ सहदायिक होने से अपवर्जित की जाती थी, क्योंकि सहदायिकी की शर्त यह थी कि सहदायिक विभाजन का दावा कर सके और किसी स्त्री को यह हक नहीं प्राप्त था; यद्यपि जब कभी विभाजन होता था. कुछ स्त्रियों को, जैसे पलियों एवं माताओं को, विभाजन में अंश प्राप्त होता था। यद्यपि सहदायिकी के प्रादर्भाव के लिए एक समान पूर्वज आवश्यक है, फिर भी वह उसके बिना अस्तित्व में बना रह सकता है जिसमें साम्पाश्विक तथा उसके वंशज हो सकते हैं जो मृत समान पूर्वज से तीन पीढ़ी से अधिक दूर के हो मिताक्षरा विधि के अन्तर्गत हकों की सामूहिकता तथा स्वामित्व की एकता सहदायिकी का विशेष Tण है। प्रत्येक सहदायिक को संयुक्त परिवार तथा सामान्य सम्पत्ति के भाग का अधिकार प्राप्त है। अत: राशिकी का यह अधिकार है कि वह सहदायिकी सम्पत्ति में अपने निश्चित हक का दावा कर सके। यह

1.देवराज प्रधान बनाम घनश्याम तथा अन्य, ए० आई० आर० 1979 उडीसा 1621

2 राम इकबाल बनाम खैरा देवी, ए० आई० आर० 1971, पटना 2871  ए० आई० आर० 2014 एस० सी०2665.

4. ० आई० आर० 1970 एस० सी० 14; पुन्न बीबी बनाम राधा किशन, 31 कल० 479: दशरथ राव बनाम रामचन्द्र, 1951 बा० 1411

5. येनमाला बनाम रमनदोरा, एम० एच० सी० आर० 93; विश्वनाथ बनाम गनेश, 10 एच०सी० आर० 4441

दुल्लर के वाद में यह अभिनिर्धारित किया कि सहदायिकों के बीच सहवधिक सम्पत्ति का न्यागमन सामान्य रूप से होगा। प्रस्तुत वाद में ब ने अपने पिता स के द्वारा छोड़ी गयी सम्पत्ति में 1/3 भाग उत्तराधिकार में प्राप्त किया था, क्योंकि ब के द्वारा छोड़ी गयी सम्पत्ति में उसके दो पुत्रों एवं मृतक पिता के बीच सर्वप्रथम ऐसी सम्पत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 के अन्तर्गत निर्धारित की जायेगी जिसके परिणामस्वरूप काल्पनिक विभाजन के अन्तर्गत मृतक पिता एवं उसके दोनों पुत्रों के बीच सर्वप्रथम सम्पत्ति का विभाजन किया जायेगा।

सहदायिकी कब समाप्त हो जाती है?—हिन्दू सहदायिकी दो प्रकार से समाप्त हो जाती है-

(1) विभाजन द्वारा, तथा

(2) अन्तिम उत्तरजीवी सहदायिकी की मृत्यु द्वारा।

सहदायिकी तथा संयुक्त हिन्दू परिवार-संयुक्त परिवार एवं सहदायिकी एक-दूसरे के पर्यायवाची नहीं हैं। संयुक्त परिवार एक व्यापक अर्थ में प्रयुक्त होता है, जिसमें एक ही पूर्वज के वंशज उनकी मातायें, पत्नियाँ अथवा विधवायें और अविवाहिता पुत्रियाँ सम्मिलित हैं। यह सदस्यों के परस्पर सपिण्डता पर आधारित है। यह सदस्यों के कृत्य से निर्मित नहीं होता वरन् विधि-सृष्ट होता है। इसके विरुद्ध सहदायिकी एक परिमित संगठन है जिसमें परिवार के वही सदस्य आते हैं जो पूर्वज की पैतृक सम्पत्ति में जन्म से ही अधिकार प्राप्त करते हैं तथा जिनकी उस सम्पत्ति का स्वेच्छा से विभाजन करने का अधिकार होता है। इस सहदायिकी में किसी वंश की तीन पीढ़ी तक के वंशज अर्थात् पुत्र, पौत्र एवं प्रपौत्र आते हैं। सुरजीत लाल क्षाब्दा बनाम कमिश्नर इन्कम टैक्स के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह संप्रेक्षित किया कि संयुक्त हिन्दू परिवार एक बड़ी संस्था है जिसमें ऐसे व्यक्तियों का समूह होता है जो जन्म, विवाह अथवा दत्तक-ग्रहण से उत्पन्न सपिण्डता से सम्बन्धित होते हैं। संयुक्त परिवार का मौलिक नियम सपिण्डता है। संयुक्त परिवार के निर्माण के लिए एक पुरुष-सदस्य भी पर्याप्त है यदि उसके अन्य स्त्री-सदस्य हैं। मिताक्षरा में यह बात इस प्रकार कही गई है- “अतएव पिता और पितामह की सम्पत्ति में जन्म से ही अधिकार होता है। पिता के न चाहने पर भी पुत्र की इच्छा से पितामह की सम्पत्ति का विभाजन हो जाता है। अविभक्त सम्पत्ति को पिता द्वारा दूसरे को देने अथवा विक्रय करने में पौत्र का उसे रोकने का अधिकार होता है। पिता के द्वारा अर्जित सम्पत्ति को रोकने का अधिकार नहीं होता। ऐसा पुत्र के परतन्त्र होने के कारण है।” तीन पीढ़ी तक के वंशजों को यह अधिकार इसलिये प्राप्त है कि वे पूर्वज को पिंडदान करने के अधिकारी होते हैं। इस प्रकार सहदायिकी संयुक्त परिवार की तुलना में एक परिमित संगठन है जिनमें नारियाँ नहीं आतीं। इसके अन्तर्गत तीन पीढ़ी तक के पुरुष वंशज (पुरुष सदस्य) ही आते हैं। रघुवीर सिंह बनाम दिलीप सिंह, के मामले में पंजाब उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि जहाँ कोई सहदायिक सम्पत्ति जो संयुक्त हिन्दू परिवार के सदस्यों के कब्जे में है तथा वह सम्पत्ति ऐसी हो जिसका विभाजन करना सम्भव न हो तो ऐसी स्थिति में सम्पत्ति का विभाजन अन्य सहदायिकी की मौजूदगी पर नहीं हो सकता। एक संयुक्त परिवार में एक से अधिक सहदायिकी हो सकते हैं, किन्तु एक सहदायिकी में एक से अधिक संयुक्त परिवार नहीं हो सकता। सहदायिकी संयुक्त परिवार में निम्नलिखित मामलों में भिन्न

1. ए० आई० आर० 2007 इलाहाबाद 2002।।

2. तस्मात् पैतृके पैतामहे च द्रव्ये जन्मनैव स्वत्वम्। पितरि विभागं अनिच्छति अपि पुत्रेच्छया – पैतामह-द्रव्यविभागो भवति। तथा अविभक्तिने पिता पैतामहे द्रव्ये दीयमाने विक्रीमाणे वा पौत्रस्य निषेधे अपि अधिकार पित्रार्जिते न तु निषेधाधिकारः। तत्परतंत्रत्वात्।। मिताक्षरा।।

3. ए० आई० आर० 1976 एस० सी० 1891

4. ए० आई० आर० 2004 पी० एण्ड एच० 220.

सहदायिकी एवं संयुक्त हिन्दू परिवार में अन्तर

1.. प्रथम, जब कि संयुक्त परिवार के सदस्यों की संख्या तथा समान पूर्वजों के वंशजो की दो सीमित नहीं होतो, सहदाधिको संयुक्त परिवार के केवल कुछ निश्चित सदस्यों के लिये होती है।

द्वितीय, सहदापिको केवल उन पुरुष-सदस्यों तक ही सीमित होती है जो पूर्वज से उसको सम्मिलित करके चार पोड़ी के अन्तर्गत आते है जबकि संयुक्त परिवार में इस प्रकार की कोई भी सौमितताये नही रहती

जत्तीय, सहदाथिको केवल पुरुष-सदस्यों तक ही सीमित होने के कारण अन्तिम सहदायिकी को मृत्यु के बाद समाप्त हो जाती है, जब कि संयुक्त परिवार ऐसे सहदायिक को मृत्यु के बाद भी स्थिर रहता है।

(4) चतुर्थ, पाप कि प्रत्येक सहदायिको या तो संयुक्त परिवार होता है या उसका भाग; किन्तु इसके विपरीत सदैव सत्य नहीं होता, अर्थात् प्रत्येक संयुक्त परिवार सहदायिकी नहीं है। इन्हीं उपर्युक्त बातो का समर्थन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय बाबूलाल बनाम चंद्रिका प्रसाद में किया है। न्यायाधीश श्री मित्र ने यह संप्रेक्षित किया कि एक संयुक्त परिवार एक समान पूर्वज से उत्पन्न बशजो तथा उनको पालियों एवं अविवाहिता पुत्रियों को भी सम्मिलित करता है, किन्तु एक हिन्दू सहदाथिको अत्यन्त संकुचित संस्था है जिसके वही सदस्य होते हैं जो सहदायिकी अथवा संयुक्त सम्पत्ति में जन्मतः अधिकार प्राप्त करते है। इस कोटि में पुत्र, पौत्र तथा प्रपौत्र ही आते हैं।

किसी सहदायिक के अवैध पुत्र सहदायिक के सदस्य नहीं होते। अवैध पुत्र का तात्पर्य रखैल को सन्तान से है-हालाँके उन्हें भरण-पोषण पाने का अधिकार है। सहदायिक न होने के कारण उसे विभाजन माँगने का अधिकार नहीं है। किन्तु पिता की मृत्यु के बाद वह विभाजन का दावा कर सकता है और एक वैध पुत्र के अंश के आधे के बराबर अंश प्राप्त कर सकता है।

एक सहदायिको के अन्तर्गत भी सहदायिको हो सकता है। उदाहरणार्थ, मान लीजिए क के तीन पुत्र है-7, फ, बफ के दो पुत्र च, छ होते हैं तथा ब के दो पुत्र म, न होते हैं। ये सभी सन्ताने क के साथ सहदायिको निर्मित करते है। इनमें यदि फ तथा ब की मृत्यु हो जाय और वे अपनी पृथक् सम्पत्ति छोड़कर मर जाते है तो मृत फ के दोनों पुत्र च तथा छ मिलकर एक सहदायिकी अलग से तथा द के दोनों पुत्र म एवं न एक सहदायिको अलग से निर्मित करेंगे जो अपने मृत पिता की पृथक सम्पत्ति को सहदायिको के रूप में अलग से प्राप्त करेंगे। यदि इनमें से च अथवा छ एवं म तथा न के कोई पुत्र उत्पन्न होता है तो वह अपने मृत पितामह (Grandfather) फ एवं ब की पृथक् सम्पत्ति में जन्म से अधिकार सहदायिक के रूप में प्राप्त कर लेंगे तथा ‘क’ प्रपितामह (Great Grandfather) के साथ भी सहदायिको का निर्माण करेंगे; क्योंकि ‘क’ से नीचे की तीन पुरुष पीढ़ी के अन्तर्गत वे आते है और इस प्रकार के की सम्पत्ति में भी जन्म से अधिकार प्राप्त कर लेंगे। इस प्रकार एक सहदायिको क’ के साथ निर्मित होता है। दूसरा सहदायिकी मृत पिता फ एवं ब के साथ उनकी पृथक् सानि के कारण निर्मित होता है। इस विषय पर उच्चतम न्यायालय ने भगवान बनाम रेवती’ के ले में विचार किया था और इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि सहदायिकी के अन्तर्गत भी सहदायिकी हो सकती है।

सहदायिकी की विशेषताएँसहदायिकी केवल पुरुष-सदस्यों द्वारा निर्मित होती है। यह सविधि-सष्टि है। इसके अन्तर्गत दत्तक-ग्रहण द्वारा छोड़कर किसी भी अन्य तरीके से बाहरी व्यक्ति समिलित नहीं किये जा सकते। सहदायिकी के सदस्यों के मध्य सम्पत्ति का संस्वामित्व होता है। किसी समय की मत्य हो जाने पर सहदायिको सम्पत्ति में उसका अंश उसके दायादों को न्यागत नहीं

1. ए० आई० आर० 1977 एन० ओ० सी० 229 इला०

2. गुरुनारिन दास बनाम गुरुटहल दास, 1952 एस० सी० 2251

3. ए० आई० आर० 1962 एस० सी० 2871

होता वरन् सहदायिकी के उत्तरजीवी अन्य सदस्यों को उत्तरजीविता के सिद्धान्त के अनुसार न्यागत होता है। सहदायिकी का कोई सदस्य सहदायिकी सम्पत्ति में अपने अंश को इच्छापत्र द्वारा निर्वर्तित नहीं कर सकता था। (हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 30 के अनुसार अब मिताक्षरा का कोई सहदायिकी सम्पत्ति में अपने अंश को इच्छापत्र द्वारा निर्वर्तित कर सकता है।) मिताक्षरा सहदायिकी में किसी सहदायिक का सहदायिकी सम्पत्ति में कोई निश्चित अंश नहीं होता। अप्पू वियर बनाम राम सुब्बा के वाद में यह प्रतिपादित किया गया था कि संयुक्त परिवार में जब तक वह संयुक्त रहता है, कोई भी सदस्य अविभक्त सम्पत्ति के विषय में यह नहीं कह सकता कि उसका अमुक निश्चित अंश है। अविभाजित सम्पत्ति की स्थिति में प्रत्येक सदस्य का अंश बढ़ता-घटता रहता है।

सहदायिकी में प्रत्येक सदस्य को यह अधिकार है कि दूसरे सहदायिक को सम्पत्ति के अन्यसंक्रामण से रोका जा सकता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक सदस्य को सहदायिकी सम्पत्ति में बँटवारा कराने का अधिकार प्राप्त है। सहदायिकी का यह रूप दायभाग में नहीं लागू होता। वहाँ पिता के जीवन-काल में, उसके द्वारा धारित सम्पत्ति में चाहे पैतृक हो अथवा स्वार्जित, वंशजों को कोई हित नहीं उत्पन्न होता। पिता की मृत्यु के बाद सम्पत्ति उत्तराधिकार द्वारा न्यागत हो जाती है।

विनोद जेना बनाम अब्दुल हामिद खान के वाद में उड़ीसा उच्च न्यायालय ने यह कहा कि हिन्दू विधि का यह एक मुख्य सिद्धान्त है कि विभाजन के प्रमाण के अभाव में यह उपधारणा होगी कि प्रत्येक हिन्दू-परिवार भोजन, पूजा तथा सम्पदा (आवास-गृह) के सम्बन्ध में संयुक्त होगा। यह उपधारणा सगे भाइयों के सम्बन्ध में अधिक दृढ़ होती है। एक परिवार के स्थापक अर्थात् समान पूर्वज से जितना अधिक वे दूर होते जाते हैं यह उपधारणा कमजोर होती जाती है।

हिन्दू मिताक्षरा सहदायिकी के लक्षण-मिताक्षरा सहदायिकी के सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय ने स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया बनाम घमण्डी राम के मामले में महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। इसमें न्यायालय ने यह निरूपित किया है कि मिताक्षरा सहदायिकी विधि की प्रक्रिया से उत्पन्न होती है न कि पक्षकारों के पारस्परिक समझौते से। किन्तु जहाँ कोई पुत्र दत्तक ग्रहण में लिया जाता है वहाँ उस दत्तकग्रहीत पुत्र का सहदायिकी में सम्मिलित किया जाना भले ही पक्षकारों के कृत्य से होता है। मिताक्षरा सहदायिकी में न्यायालय के अनुसार कई विशेषतएँ हैं; जैसे कि-

(1) समान पूर्वज की पुरुष सन्ताने तीन पीढ़ी तक की सहदायिकी निर्मित करते हैं जिनको जन्म से ही उसमें अधिकार उत्पन्न हो जाता है।

(2) सहदायिकी के इन सदस्यों को अपना अंश माँगने और अलग करवाने का अधिकार होता|

(3) जब तक विभाजन नहीं होता प्रत्येक सदस्य को एक-दूसरे के साथ सम्पूर्ण सम्पत्ति पर स्वामित्व होता है।

(4) सह-स्वामित्व के कारण उसका कब्जा तथा सम्पत्ति के प्रयोग का अधिकार संयुक्त तथा साथ होता है।

(5) सम्पत्ति का अन्यसंक्रामण तब तक नहीं हो सकता जब तक आवश्यकता न हो तथा अन्य सदस्य सहमति न दे दिये हों। किसी सदस्य की मृत्यु हो जाने पर उसका हिस्सा उत्तरजीविता से अन्य पुरुष-सदस्यों में न्यागत हो जाता है।

1. (1866) 11 एम० आई० ए० 751

2. महाराष्ट्र एवं पंजाब शाखाओं में यह अधिकार पिता के जीवन-काल में उसकी सहमति के बिना प्रयोग नहीं किया जाता।

3. ए० आई० आर० 1975 उड़ीसा 1591

4. ए० आई० आर० 1969 एस० सी० 13301

मिताक्षरा विधि में एक सहदायिकी के निम्नलिखित विशिष्ट लक्षण है-

(1) स्वामित्व की इकाई-मिताक्षरा सहदायिकी का विशिष्ट लक्षण स्वामित्व की इकाई है। सहदायिकी सम्पत्ति में स्वामित्व किसी एक ही व्यक्ति में निहित नहीं रहता अपितु यह पूरे परिवार में निहित रहता है। सहदायिकी के समस्त सदस्यों का सम्पूर्ण सम्पत्ति पर हक रहता है, किसी एक सदस्य का किसी एक खण्ड पर कोई हक नहीं रहता। अतएव जब तक सदस्यगण अविभाजित हैं, यह प्रस्ताव नहीं कर सकते कि अविभाजित तथा संयुक्त सम्पत्ति में उनका एक निश्चित अंश है।

थम्मा वेंकट सुब्बाम्मा बनाम थम्मा रत्तम्मा के वाद में उपरोक्त बात की पुष्टि करते हुए उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि मिताक्षरा विधि के अन्तर्गत सहदायिकी का सारतत्व स्वामित्व की इकाई तथा हितों की सामूहिकता है। किसी सहदायिक का सहदायिकी सम्पत्ति में कोई निश्चित अंश नहीं होता बल्कि उसका अविभक्त हित उसमें रहता है जो किसी की मृत्यु से बढ़ जाता है और किसी नये पुरुष सन्तान के जन्म पर घट जाता है। सहदायिकी सम्पत्ति में सहदायिकी का अंश जन्मत: उत्पन्न हो जाता है उसका अंश पिता के अंश के बराबर होगा।

(2) अंशों की अनिर्धारणीयता-सहदायिकी के सदस्य का संयुक्त सम्पत्ति में अंश परिवर्तनशील होता है, क्योंकि वह परिवार के सदस्यों की मृत्यु तथा जन्म से बढ़ता-घटता रहता है। किसी नये सदस्य के जन्म से अंश कम हो जाता है एवं किसी सदस्य की मृत्यु से अंश बढ़ जाता है। अत: केवल विभाजन के बाद से ही अंश को निश्चित किया जा सकता है। अतः हिन्दू परिवार में जब तक सदस्य अविभाजित रहते हैं तब तक उनमें से कोई एक यह नहीं कह सकता है कि उसका एक निश्चित अंश है। कमिश्नर ऑफ गिफ्ट टैक्स बनाम एन० एस० गेट्टी चेट्टियार’ के वाद में उच्चतम न्यायालय ने उपर्युक्त प्रतिपादनों का पुष्टिकरण करते हुए कहा कि जब तक परिवार अविभक्त रहता है, परिवार का कोई सदस्य संयुक्त सम्पत्ति के विषय में यह नहीं कह सकता कि उसका उसमें कोई निश्चित अंश है। सभी सदस्य परिवार की सम्पत्ति के स्वामी हैं। उसका अंश तभी निश्चित रूप से बताया जा सकता है जब कि संयुक्त स्थिति में विघटन होता है। अत: कोई सहदायिकी संयुक्त हिन्दू परिवार की सम्पत्ति में विभाजन के पूर्व किसी निश्चित अंश का हकदार नहीं कहा जा सकता।

(3) हक की सामूहिकता (Community of Interest)—सहदायिकी के इस लक्षण से यह स्पष्ट होता है कि सहदायिकी सम्पत्ति में किसी सदस्य का कोई विशेष हक नहीं होता है तथा न वह उसमें एकाधिकार कब्जा रखता है। प्रिवी कौंसिल के न्यायाधीश ने यह ठीक ही कहा था कि परिवार के सभी सदस्यों में हक की सामूहिकता तथा स्वामित्व की इकाई संयुक्त परिवार की विशेषता है।। नानचंद गंगाराम बनाम मलप्पा महालिंगप्पा के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि एक संयुक्त परिवार में कोई सदस्य यह नहीं कह सकता कि वह आधे का अधिकारी है अथवा एक-तिहाई या चौथाई अंश का अधिकारी है। सहदायिकी सम्पत्ति का यह सार है कि इससे स्वामित्व की इकाई तथा हकों की सामूहिकता होती है तथा सदस्यों के अंश को पारिभाषित नहीं किया जाता। इस सम्बन्ध में शेर सिंह बनाम गम्दूर सिंह के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह सम्प्रेक्षित किया कि जहाँ पर कोई व्यक्ति सहदायिकी संयुक्त परिवार का सदस्य है और वह एक संयक्त परिवार के साथ रहता है तो ऐसी स्थिति में वह इस बात का दावा नहीं कर सकता कि वह सम्पूर्ण सम्पत्ति में अपने हक से ज्यादा का अधिकारी है। अर्थात् ऐसी सम्पत्ति में उन सभी सदस्यों का समान हक होगा,

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1. ए० आई० आर० 1987 एस० सी० 17751

2. गिरजानन्दिनी बनाम ब्रजेन्द्र, ए० आई० आर० 1967 एस० सी० 11241

3. ए० आई० आर० 1971 एस० सी० 4101

4. कामता नाटच्यार बनाम राजा ऑफ शिवगंगा (1863), 9 एम० आई० ए० 5391

5. ए० आई० आर० 1976 एस० सी० 8321

6. ए० आई० आर० 1997 एस० सी० 13331

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