B.Com Business Economics Books Study Material Chapter 3 PDF Download

B.Com Business Economics Books Study Material Chapter 3 PDF Download : नमस्कार दोस्तों में दीपक कुमार एक बार फिर से स्वागत करता हूँ आप सभी का हमारी वेबसाइट SscLatestNews.Com में, दोस्तों आज की पोस्ट में आप सभी अभ्यर्थी B.Com 1st Year (2nd Semester) Business Economics Book Study Material in Hindi Free PDF Download करने जा रहे है जिसे आप पढ़ने के बाद सबसे निचे दिए गये टेबल के माध्यम से अपने मोबाइल या कंप्यूटर में हमेशा के लिए सम्भालकर रख सकते है |

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B.Com Business Economics Books Study Material Chapter 3 PDF Download
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Business Economics Notes for B.Com 2nd Year PDF पोस्ट बनाने के लिए आप सभी हमसे काफी समय से मांग कर रहे थे जिसे आज हम इस पोस्ट में शेयर भी कर रहे है | अभ्यर्थियो को बता दे की आप Business Economics Chapter के आखिर से MCQ Previous Year Questions Answers Model Sample Paper in Hindi & English दोनों ही भाषा में पढ़ सकते है |

अध्याय 3

आर्थिक समस्या एवं आर्थिक प्रणाली के कार्य (The Economic Problem and Functions of Economic System)

आर्थिक समस्या का अर्थ | (Meaning of Economic Problem)

मानवीय आवश्यकताएँ न केवल अनन्त होती हैं, वरन् उनकी तीव्रता (महत्व) में भी अन्तर होता है। आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए प्रयुक्त साधन न केवल सीमित होते हैं बल्कि उन्हें वैकल्पिक प्रयोगों में भी प्रयुक्त किया जा सकता है। अतः मानवीय आवश्यकताओं की असीमितता, साधनों की सीमितता एवं उनके वैकल्पिक प्रयोग होने के कारण मानवीय आचरण ‘चुनाव’ के रूप में प्रकट होता है। इसे रोबिन्स ने मानवीय क्रिया का आर्थिक पहलू कहा है और यही आर्थिक समस्या का मुख्य रूप है। मानवीय आचरण का यह आर्थिक पहलू संसाधनों की दुर्लभता अथवा सीमितता के कारण उत्पन्न होता है। इसलिए यह कहा जाता है कि विश्व की सभी प्रकार की आर्थिक प्रणालियों में, चाहे वे पूँजीवादी हो या समाजवादी अथवा मिश्रित, आधारभूत आर्थिक समस्या साधनों की सीमितता की है (The fundamental Economic Problem is Scarcity of resources)|

आर्थिक समस्या उत्पन्न होने के कारण (Reasons for arising economic Problem)

किसी भी आर्थिक प्रणाली की आधारभूत समस्या ‘चुनाव’ की होती है जो निम्नांकित कारणों की वजह से उत्पन्न होती हैं

1.असीमित साध्य (Unlimited ends)-मानवीय आवश्यकताएँ जिन्हें रोबिन्स ने साध्य कहा है, आकाश की भाँति अनन्त होती है। ये समय और विकास के साथ बढ़ती रहती हैं। ये परस्पर प्रतिस्पर्धी होती हैं तथा बार-बार (recurring) उत्पन्न होती रहती हैं। आवश्यकताओं की अनन्तता के कारण सभी आवश्यकताओं को एक साथ संतुष्ट किया जाना सम्भव नहीं है। इसलिए आवश्यकताओं के चुनाव की समस्या उत्पन्न होती है।

2. सीमित साधन (Scarce resources)-व्यक्ति तथा अर्थव्यवस्था के पास मानवीय आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने के साधन सीमित होते हैं अर्थात् साधनों की उपलब्धि उनकी माँग की तुलना में कम होती है। साधनों की सीमितता निरपेक्ष न होकर सापेक्षिक होती है अर्थात् साधनों की पूर्ति आवश्यकताओं की असीमितता के सन्दर्भ में सीमित होती है। उदाहरण के लिए, सड़े सेब भले ही संख्या में कम हों, फिर भी सीमित नहीं कहे जा सकते क्योंकि उनकी माँग शून्य होती है। जबकि ताजे सेब संख्या में अधिक होने के उपरान्त भी सीमित हो सकते हैं बशर्ते कि उनकी माँग उनकी पूर्ति की तुलना में अधिक हो। चूँकि साधन सीमित होते हैं। इसलिए उनके द्वारा सभी आवश्यकताओं की पूर्ति एक साथ किया जाना सम्भव नहीं है, परिणामस्वरूप चुनाव की समस्या उत्पन्न हो जाती है, अर्थात् साधन का प्रयोग किस आवश्यकता की पूर्ति हेतु किया जाए?

3. साधनों के वैकल्पिक प्रयोग (Alternative uses of resources)-साधन न केवल सीमित होते हैं, वरन उनके वैकल्पिक प्रयोग भी होते है। यदि साधन के वैकल्पिक प्रयोग नहीं होते, तो चुनाव की समस्या पैदा नहीं होती क्योंकि ऐसी स्थिति में साधन का प्रयोग केवल एक ही उपयोग में होता। साधनों के वैकल्पिक प्रयोग होने के कारण चुनाव की समस्या इस रूप में उत्पन्न होती है कि साधन को उसके किस प्रयोग में काम लिया जाये?

4. साध्यों की तीव्रता में अन्तर (Difference in intensity of ends)- आवश्यकताएँ न केवल असीमित होती है वरन् उनके सापेक्षिक महत्व में भी अन्तर होता है अर्थात कछ आवश्यकताएँ अन्य की तलना में अधिक महत्वपूर्ण होती हैं। आवश्यकताओं की तीव्रता में अन्तर होने के कारण उनके चयन की समस्या उत्पन्न हो जाती है अर्थात् किस आवश्यकता को पहले सन्तुष्ट किया जाये

और किसको बाद में। यदि सभी आवश्यकताएँ समान महत्त्व की होती. तो फिर चयन का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किन आवश्यकताओं को पहले सन्तुष्ट किया जाये और किनको बाद में। आवश्यकताओं की तीव्रता में अन्तर होने के कारण ही आवश्यकताओं की प्राथमिकताओं का प्रश्न उठ खड़ा हुआ है।

रोबिन्स के मतानुसार कोई भी आर्थिक समस्या (चनाव की समस्या) तभी उत्पन्न होती है जब उपर्युक्त चारों तत्व एक साथ विद्यमान होते हैं। इनमें से किसी भी तत्व की अनुपस्थिति से यदि कोई समस्या उत्पन्न होती है, तो वह आर्थिक समस्या न होकर तकनीकी समस्या होगी।

साध्यों का साधनों से समायोजन (Adjustment of Ends with means)- उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि वस्तुतः कोई भी आर्थिक समस्या असीमित आवश्यकताओं की सन्तुष्टि हेतु सीमित एवं वैकल्पिक प्रयोग वाले साधनों के समायोजन की समस्या है और यह समस्या चयन के रूप में परिलक्षित होती है। यदि साध्य दिये हए हो तो उन्हे न्यूनतम साधनों के प्रयोग द्वारा प्राप्त करने की समस्या है और यदि साधन दिये हए हो. तो उन दिये हए साधनों से अधिक से अधिक आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने की समस्या है। इन दोनों स्थितियों में ही असीमित साध्यों के सन्दर्भ में वैकल्पिक उपयोग वाले सीमित साधनों के सर्वश्रेष्ठ एवं मितव्यतापूर्ण प्रयोग की आवश्यकता है जिससे अधिकतम आर्थिक कल्याण का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।

उत्पादन सम्भावना वक्र द्वारा आर्थिक समस्या का विवेचन (Explanation of Economic Problem through Production Possibility curve)

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आर्थिक समस्या का अधिक व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक विवेचन उत्पादन सम्भावना वक्र की सहायता से किया जा सकता है। इसलिए यहाँ पहले उत्पादन सम्भावना वक्र की अवधारणा को ठीक से समझ लेना आवश्यक है।

उत्पादन सम्भावना वक्र का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Production Possibility Curve) उत्पादन सम्भावना वक्र एक ऐसा वक्र होता है जो वस्तुओं •X’ तथा ‘Y’ के उन सभी अधिकतम प्राप्य उत्पत्ति संयोगों को बताता है जो साधनों की एक दी हुई मात्रा के पूर्ण एवं कुशल प्रयोग द्वारा उत्पादन तकनीक की एक निश्चित व दी हुई स्थिति में प्राप्त किये जा सकते हैं। दूसरे शब्दों में, एक उत्पादन सम्भावना वक्र साधनों की एक स्थिर मात्रा और एक दी हुई उत्पादन तकनीक पर दो वस्तुओं की अधिकतम उत्पादन की जा सकने वाली मात्राओं के विभिन्न सम्भव संयोगों को प्रकट करता है।

माइकल पी. टोडारो के अनुसार, “दी हुई टेक्नोलोजी तथा भौतिक व मानवीय साधनों की दी हुई मात्रा की दशा में एक उत्पादन सम्भावना वक्र दो वस्तुओं, जैसे चावल व रेडियो, के उन अधिकतम प्राप्य संयोगों को दर्शाता है, जो समस्त साधनों के पूर्ण व कार्यकुशल उपयोग (Fully and efficiently employed) की स्थिति में प्राप्त होते हैं।”

उत्पादन वक्र की मान्यताएँ (Assumptions of Production Possibility Curve)-एक उत्पादन सम्भावना वक्र निम्नांकित मान्यताओं पर आधारित होता है

1. पूर्ण रोजगार की स्थिति (Full employment situation)-अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार की स्थिति विद्यमान होती है अर्थात् अर्थव्यवस्था में कोई भी उत्पादन का साधन बेरोजगार एवं अल्प बेरोजगार की स्थिति में नहीं होता है। ऐसी स्थिति में साधनों का पूर्ण उपयोग हो रहा होता है।

2.साधनों की पूर्ति स्थिर होना (The amount of resources supply is fixed)-अर्थव्यवस्था में उत्पादन के साधनों की मात्रा दी हुई एवं स्थिर होती है, लेकिन वे विभिन्न व वैकल्पिक उपयोगों के बीच परिवर्तित हो सकते हैं। साधनों की मात्रा में परिवर्तन होने पर उत्पादन सम्भावना वक्र परिवर्तित हो जाता है। _ 3. उत्पादन की तकनीक स्थिर होना (There is no change in technology)-विश्लेषण अवधि के दौरान उत्पादन तकनीक में कोई परिवर्तन नहीं होता है अर्थात् वह दी हुई होती है।

4. साधनों का उपयोग कुशलता से होना (All resources are efficiently employed)-उत्पादन सम्भावना वक्र एक पूर्ण एवं कार्यकुशल अर्थव्यवस्था की मान्यता पर आधारित है जिसमें साधनों की किसी भी प्रकार की बर्बादी नहीं होती है। साधनों का श्रेष्ठतम उपयोग होता है जिससे अधिकतम उत्पादन की सम्भावना होती है।

लायी जाती है जिन्हें आर्थिक प्रणालियाँ कहते हैं। आर्थिक प्रणालियों में स्वतन्त्र उद्यम वाली या पुँजीवादी अर्थव्यवस्था, समाजवादी अर्थव्यवस्था तथा मिश्रित अर्थव्यवस्था का विशेष उल्लेख किया जाता है।

स्वतन्त्र उद्यम वाली अथवा पूँजीवादी अर्थव्यवस्था वह होती है जिसमें निजी सम्पति का कानुनी अधिकार, निजी उद्यम की स्वतन्त्रता, उपभोक्ता की सार्वभौमिकता, निजी लाभ का उद्देश्य एवं स्वतन्त्र मुल्य तन्त्र की उपस्थिति होती है। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के रूप में हम अमेरिका की अर्थव्यवस्था को ले सकते हैं। पूँजीवादी के विपरीत विश्व में अनेक समाजवादी अर्थव्यवस्थाएं हैं। समाजवादी अर्थव्यवस्था वह होती है जिसमें उत्पादन के भौतिक साधनों का स्वामित्व सरकार अथवा समाज का होता है और उत्पादन सामाजिक हित को ध्यान में रखकर किया जाता है न कि निजी हित के लिए। ऐसी अर्थव्यवस्था में आर्थिक तथा सामाजिक विषमताएँ नहीं होती है। समाजवादी व्यवस्था नियोजित व्यवस्था होती है जिसमें महत्वपूर्ण आर्थिक निर्णय सरकार अथवा नियोजन सत्ता लेती है। कुछ समय पूर्व तक रूस तथा अन्य साम्यवादी देशों की अर्थव्यवस्थाएँ इसी श्रेणी में सम्मिलित की जाती थीं। पूँजीवादी तथा समाजवादी अर्थव्यवस्थाओं के अतिरिक्त आज अधिकांश देशों में मिश्रित अर्थव्यवस्था देखने को मिलती है। मिश्रित अर्थव्यवस्था उस अर्थव्यवस्था को कहते हैं जिसमें निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र साथ-साथ कार्य करते हैं। इस अर्थव्यवस्था में व्यक्तियों के साथ-साथ सरकार भी आर्थिक क्रियाओं में पर्याप्त मात्रा में भाग लेती है। इस अर्थव्यवस्था में एक तरफ निजी क्षेत्र निजी लाभ के लिए कार्य करता है, वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक क्षेत्र सम्पूर्ण समाज के लाभ अथवा हित के लिए कार्य करता है। मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले देशों में कुछ देशो का अधिक झुकाव पूँजीवादी की ओर तथा कुछ का समाजवाद की तरफ अधिक होता है। भारतीय अर्थव्यवस्था एक मिश्रित अर्थव्यवस्था है।

आर्थिक प्रणाली के प्रमुख कार्य अथवा प्रमुख समस्याएँ (Chief Functions or Central Problems of an Economic System)-आर्थिक प्रणाली का अर्थ जानने के बाद हमारे लिए यह जानना आवश्यक हो जाता है कि एक आर्थिक प्रणाली कौन-कौन से कार्य करती है? एक आर्थिक प्रणाली द्वारा किये जाने वाले कार्यों की संख्या के सम्बन्ध में अर्थशास्त्रियों का एक मत नहीं है। प्रो. सेम्युलसन के अनुसार एक अर्थव्यवस्था के आधारभूत कार्य तीन होते हैं। प्रो. स्टिगलर के अनुसार चार, प्रो, ओच्सेन फेल्ट, प्रो. एफ. एच. नाइट, प्रो मिल्टन फ्रीडमैन तथा प्रो. लेफ्टविच के अनुसार पाँच तथा प्रो. हाम के अनुसार सात होते हैं। अधिकांश अर्थशास्त्र अर्थव्यवस्था के पाँच आधारभूत कार्यों पर सहमत है, अत: यहाँ हम अर्थव्यवस्था के पाँच कार्यों का वर्णन करेंगे। ये पाँच कार्य निम्नलिखित हैं

1. क्या उत्पादन किया जाए और कितना उत्पादन किया जाए (What is be produced and how much is to be produced)-एक अर्थव्यवस्था का सर्वप्रथम महत्वपूर्ण कार्य यह निर्धारित करना होता है कि किन वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन किया जाये? एक अर्थव्यवस्था में समाज की आवश्यकताएँ असीमित होती हैं जबकि इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वैकल्पिक प्रयोग वाले सीमित साधन उपलब्ध होते हैं। समाज की समस्त आवश्यकताओं को एक साथ पूरा नहीं किया जा सकता है। अत: समाज को चनाव करना पड़ता है कि उपलब्ध साधनों को किन-किन वस्तुओं के उत्पादन में लगाया जाए, जिससे उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं की यथा सम्भव पूर्ति हो सके। अर्थव्यवस्था में किन वस्तुओं का उत्पादन किया जाए-इस बात का निर्धारण प्रमुख रूप से इस बात पर निर्भर करेगा कि उपभोगक्ताओं की कौन-कौन सी आवश्यकताएँ समग्र रूप से अधिक महत्वपूर्ण हैं।

और किस सीमा तक उनकी पूर्ति की जाती है? उदाहरण के लिए देश में उपलब्ध इस्पात का प्रयोग टैकों के निर्माण में किया जाये अथवा मोटर गड़ियों के निर्माण में किया जाये अथवा भवनों के निर्माण में किया जाये अथवा पुलों के निर्माण में किया जाये? अथवा थोड़ी-थोड़ी मात्रा में सभी वस्तुओं के निर्माण में किया जाये। जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, साधन सीमित होते हैं तथा आवश्यकता अनन्त। अत: उत्पादन की संरचना का निर्धारण समाज की सापेक्षिक आवश्यकताएँ, उनकी तीव्रता तथा साधनों की उपलब्धता के सामंजस्य से किया जायेगा। किन वस्तुओं का उत्पादन किया जाये इसके अन्तर्गत उपभोक्ता वस्तुओं तथा पूँजीगत वस्तुओं के सापेक्षिक उत्पादन के सम्बन्ध में निर्णय करना होता है अर्थात् कितनी मात्रा में पूँजीगत समान का उत्पादन किया जाये और कितनी मात्रा में उपभोक्ता वस्तुओं का? पूँजीगत सामान का उत्पादन भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति से सम्बन्धित होता है जबकि उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन वर्तमान की आवश्यकताओं की पूर्ति से सम्बन्धित होता है। अतः यदि किसी समय पूँजीगत वस्तुओं के उत्पादन को अधिक महत्व दिया जाता है, तो इससे वर्तमान में उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन के लिए साधन कम रह जायेंगे। इसके विपरीत वर्तमान में उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन को प्रधानता देने पर भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए साधन कम रह जायेगे। इस तथ्य को रेखाचित्र 6 से स्पष्ट किया गया है।

निष्कर्ष-उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि प्रत्येक अर्थव्यवस्था को कुछ महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न करने होते हैं। ये कार्य एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं। ये कार्य सैद्धांतिक दृष्टि से बड़े सरल लगते हैं परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से इन कार्यों का सम्पादन बड़ा जटिल कार्य होता है। एक आर्थिक प्रणाली की सफलता इन कार्यों के कुशल सम्पादन में निहित रहती है। परन्तु आर्थिक प्रणाली की सफलता का मूल्यांकन करते समय इन कार्यों की आर्थिक कुशलता के साथ-साथ इनके सामाजिक, राजनीतिक, नैतिक तथा मनोवैज्ञनिक क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रभावों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। यदि एक आर्थिक प्रणाली देशवासियों के लिए अधिक उत्पादन करने के बावजूद उनके लिए असुरक्षा, अनैतिकता, असमानता आदि उत्पन्न करती है तथा उनकी प्राकृतिक भावनाओं पर प्रतिबन्ध लगाती है व दमनकारी नीतियों को प्रोत्साहन मिलता है तो उस अर्थव्यवस्था को कभी भी कुशल नहीं माना जा सकता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

1. आर्थिक समस्या को परिभाषित कीजिये। अथवा आर्थिक समस्या से आप क्या समझते हैं? Define economic problem. Or what do you understand by an economic problem?

2. आर्थिक समस्या क्यों उत्पन्न होती है? Why does economic problem arise?

3. उत्पादन सम्भावना वक्र क्या होता है? What is production possibility curve?

4. उत्पादन सम्भावना वक्र की विशेषतायें स्पष्ट कीजिये? Explain characteristics of production possibility curve.

5. आर्थिक प्रणाली से आप क्या समझते हैं? What do you understand by an economic system?

6. आर्थिक प्रणाली के प्रमुख कार्य क्या होते हैं? What are the main functions of an economic system

निबन्धात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

1. आर्थिक समस्या को परिभाषित कीजिए तथा इसके उत्पन्न होने के कारण बताइये। Define economic problem and give reasons for its occurence.

2. उत्पादन सम्भावना वक्र से आप क्या समझते हैं? इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइये। What do you mean by production possibility curve? Give chief characteristics of it.

3. आर्थिक प्रणाली क्या होती है? आर्थिक प्रणाली के प्रमुख कार्य बताइये। What is an economic system? Describe the main functions of an economic system.

4. एक अर्थव्यवस्था की केन्द्रीय समस्याएँ क्या हैं? एक मिश्रित पूँजीवादी व्यवस्था में उनका समाधान कैसे होता है? What are the central problems of an economy? How are they solved in a mixed capital list economy?

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